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रुपया रिकॉर्ड गिरावट के बाद संभला, लेकिन क्या भारत की अर्थव्यवस्था फिसलन पर है?

24 मार्च 2026 को भारतीय रुपया थोड़ी राहत के साथ 93.84 प्रति डॉलर के आसपास मजबूत हुआ, लेकिन तस्वीर इतनी आसान नहीं है। एक दिन पहले यह 93.98 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक जा चुका था। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक इस उतार-चढ़ाव के पीछे सबसे बड़ा कारण मध्य पूर्व युद्ध, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और विदेशी निवेशकों की निकासी है। मार्च में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक लगभग 12 अरब डॉलर निकाल चुके हैं, जिससे मुद्रा और बॉन्ड बाजार दोनों दबाव में हैं। उधर 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड 6.84% तक पहुंची, जो बाजार की बेचैनी को साफ दिखाती है।

खबर का असली विवाद यहीं से शुरू होता है। एक तरफ भारत को दुनिया की सबसे तेज बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, दूसरी तरफ तेल झटके के साथ रुपया इतनी तेजी से क्यों कांप जाता है? गोल्डमैन सैक्स ने चेताया है कि यदि ऊर्जा संकट लंबा खिंचता है, तो भारत की चालू खाता स्थिति, महंगाई और विदेशी मुद्रा भंडार पर नया दबाव बन सकता है। यह भी आशंका जताई गई है कि RBI को सिर्फ महंगाई नहीं, बल्कि मुद्रा बचाने के लिए भी सख्ती करनी पड़ सकती है।

कुछ राहत इस बात से मिली कि भारतीय शेयर बाजार ने 24 मार्च को शुरुआती मजबूती दिखाई, क्योंकि अमेरिका की ओर से ईरान के ऊर्जा ढांचे पर तत्काल हमले को टालने की खबर आई। मगर राहत बेहद नाजुक है। युद्ध, तेल और डॉलर—इन तीनों का त्रिकोण भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक मिश्रण बन चुका है। सवाल अब सिर्फ इतना नहीं कि रुपया कितनी गिरावट झेलेगा; सवाल यह भी है कि क्या आम आदमी को जल्द ही पेट्रोल, गैस, किराया और रोजमर्रा के खर्च में इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

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