सोनम वांगचुक ने कहा, नेताओं-अफसरों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ें

भोपाल। सुधारवादी इंजीनियर सोनम वांगचुक( Sonam Wangchuk) ने शुक्रवार को मिंटो हॉल में मप्र के तमाम आईएएस अफसरों के कार्यक्रम (सर्विस मीट) में ‘मेकिंग इंडिया ग्रेट’ विषय पर कहा कि भारत में देशभक्ति सिनेमा हॉल में खड़े होकर राष्ट्रगान तक ही सीमित हो गई है, लेकिन इसके बाद लोग अपना काम नहीं करते।

शिक्षक पढ़ाने स्कूल नहीं जाते और अफसर अपना फर्ज पूरा नहीं करते। यदि आप इतने ही बड़े देशभक्त हैं तो इंडियन एयरलाइंस, बीएसएनएल जैसी सरकारी कंपनियां बिकने की कगार पर क्यों खड़ी है? सरकारी स्कूलों की हालत लगातार खराब हो रही है।एक कानून बनाकर देश के सभी नेताओं और अफसरों के बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाया जाना अनिवार्य करना चाहिए। इससे स्कूलों की हालत सुधरेगी। मालूम हो, वांगचुक का नाम चर्चा में तब आया, जब फिल्म थ्री इडियट( Three Idiots) में आमिर खान ने फुंसुक वांगड़ू का किरदार निभाया। यह किरदार वांगचुक से प्रेरित था।

नौ साल तक नहीं जा सके स्कूल

पेशे से इंजीनियर सोनम वांगचुक को 2018 में प्रतिष्ठित रेमन मेग्सेसे अवॉर्ड मिला था। उन्हें लद्दाख में शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए जाना जाता है। जम्मू-कश्मीर में लेह जिले के दूरस्थ गांव में उनका जन्म हुआ था। गांव के आसपास स्कूल नहीं होने की वजह से वे 9 साल तक स्कूल नहीं जा सके। जब उनके पिता जम्मू-कश्मीर में मंत्री बने तो उनका दाखिला श्रीनगर के केंद्रीय विद्यालय में कराया गया। इसके बाद उन्होंने श्रीनगर के ही नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी से बीटेक और बाद में फ्रांस से पढ़ाई की

देश ठप हुआ तो खुद को चीन का एजेंट समझें

वांगचुक ने अफसरों से कहा कि आप सबके पास बहुत अधिकार हैं। सरकारी स्कूलों को बेहतर कीजिए। यह सबसे ज्यादा जरूरी है। यदि आपने किसी बिजनेसमैन का बिजनेस रोका या लाल फीताशाही का उपयोग कर देश ठप किया तो खुद को चीन का एजेंट समझिएगा, क्योंकि चीन यही चाहता है। आप सैनिक भी हो सकते हैं और चीन के एजेंट भी। मुझे उम्मीद है एजेंट नहीं बनेंगे।

दो गुना बढ़ानी होगी उत्पादकता

वांगचुक ने कहा कि 70 साल पहले भारत और चीन बराबरी पर थे। आज चीन हमसे तीन गुना आगे है। हमें चीन से बराबरी नहीं करना, लेकिन यदि चीन हमें सताता है तो इसे हमें अपने लिए मौका बनाना होगा और अपनी उत्पादकता दोगुना बढ़ानी होगी। वांगचुक ने कहा कि देश में अभी भी हिंदी को तुच्छ समझे जाने की मानसिकता हावी है। हमने ब्रिटेन को सिर पर उठा लिया है। अंग्रेजी की गुलामी कर रहे हैं। कोरिया जापान की कॉलोनी था, लेकिन जापान वहां से गया तो कोरिया ने जापान को उसी के खेल में मात दी। हम ऐसा नहीं कर पाए।

https://www.youtube.com/watch?v=tJ-tKB33-FU

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