डिग्रियों के अंबार और महंगे लोन के जाल में फंसा देश का युवा, रोजगार का वादा सिर्फ कोरा झूठ!
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सरकार ने ‘पीएम विद्यालक्ष्मी योजना’ का दायरा देश के 1,425 से अधिक उच्च शिक्षण संस्थानों तक बढ़ा दिया है और बिना गारंटी-कॉलेटरल के शिक्षा लोन देने का दावा किया जा रहा है। योजना कागजों पर भले ही आकर्षक लगे, लेकिन इसके स्याह सच को देखना भी उतना ही जरूरी है। सवाल यह है कि जब कोई छात्र बैंक से लाखों का कर्ज लेकर इंजीनियरिंग या मैनेजमेंट की डिग्री पूरी कर भी ले, तो उसके बाद उसे रोजगार कौन देगा? आज स्थिति यह है कि विश्वविद्यालयों से निकलने वाले लाखों युवाओं के हाथ में डिग्रियां तो हैं, लेकिन काम एक चपरासी का भी नहीं है।
कोर्स पूरा होने के बाद जब नौकरी नहीं मिलती, तो वही छात्र बैंक के कर्ज के जाल में ऐसा फंसता है कि उसकी पूरी जवानी तनाव और निराशा में कट जाती है। सरकार रोजगार सृजन के मोर्चे पर पूरी तरह विफल साबित हो रही है। पकौड़े तलने को स्वरोजगार बताने वाले हुक्मरानों को जमीन पर उतरकर देखना चाहिए कि कैसे टैलेंटेड युवा एक अदद नौकरी के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं।
बिना रोजगार के शिक्षा सिर्फ एक कमर्शियल बिजनेस बनकर रह जाती है। Fourth Eye News का साफ मानना है कि जब तक शिक्षा नीति और रोजगार बाजार के बीच सीधा सामंजस्य नहीं बिठाया जाएगा, तब तक देश की युवा शक्ति इसी तरह बर्बाद होती रहेगी।
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