बस्तर की चट्टानों में छिपा इतिहास अब खुलने लगा, हजारों साल पुरानी कला पर पहली वैज्ञानिक घेराबंदी

रायपुर। बस्तर की प्राचीन गुफाओं में बने शैल चित्रों का वैज्ञानिक तरीके से वर्गीकरण और गहन अध्ययन शुरू किया गया है। उपलब्ध खुली टेक्स्ट सामग्री में यह साफ लिखा है कि छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद पहली बार इस तरह का व्यवस्थित अध्ययन शुरू हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक इस परियोजना का संचालन जगदलपुर स्थित मानव विज्ञान सर्वेक्षण, यानी एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के उप-क्षेत्रीय केंद्र द्वारा किया जा रहा है। स्रोत में यह भी कहा गया है कि इस पहल से न सिर्फ हजारों साल पुरानी कलाकृतियों की परतें खुलेंगी, बल्कि बस्तर के इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के नए आयाम भी सामने आएंगे।
खुली उपलब्ध सामग्री यहीं तक सीमित है, क्योंकि पूरी खबर पढ़ने के लिए लॉगिन की आवश्यकता बताई गई है। इसलिए इस लेख में केवल वही तथ्य शामिल किए जा रहे हैं जो बिना लॉगिन के उपलब्ध हुए। उन तथ्यों के आधार पर इतना स्पष्ट है कि यह परियोजना बस्तर के रॉक आर्ट को वैज्ञानिक नज़र से समझने की एक औपचारिक शुरुआत है और इसे सांस्कृतिक विरासत के बड़े दस्तावेजीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के तौर पर प्रस्तुत किया गया है।
खबर का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इसमें राज्य गठन के बाद पहली बार व्यवस्थित वर्गीकरण की बात कही गई है। यानी अब तक मौजूद शैल चित्रों को केवल विरासत या स्थानीय पहचान के रूप में नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अध्ययन के विषय के रूप में दर्ज किया जा रहा है। उपलब्ध स्रोत का केंद्रीय संदेश यही है कि बस्तर की हजारों साल पुरानी गुफा चित्रकला को अब संगठित ढंग से पढ़ने और वर्गीकृत करने का काम शुरू हो चुका है।




