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ट्रंप की सनक और ‘दगाबाजी’ का पुराना इतिहास: अमेरिका-ईरान समझौते को जीत बताने वाले व्हाइट हाउस के खोखले वादों पर दुनिया को नहीं है भरोसा ?

वाशिंगटन और तेहरान के बीच 15 हफ्तों की विनाशकारी जंग के बाद आखिरकार एक शुरुआती ‘शांति समझौते’ (MOU) का ऐलान कर दिया गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी चिर-परिचित नाटकीय शैली में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट लिखकर घोषणा की कि ‘ईरान के साथ डील पूरी हो चुकी है’ और दुनिया के जहाजों से कहा कि ‘अपने इंजन शुरू करो, तेल बहने दो’. पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता से हुए इस समझौते के तहत होर्मुज जलडमरू मध्य (Strait of Hormuz) को खोलने और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को हटाने पर सहमति बनी है. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप जैसे मूडी, अस्थिर और पल-पल रंग बदलने वाले नेता के दस्तखत वाले किसी कागज के टुकड़े पर कोई देश आंख मूंदकर भरोसा कर सकता है? इतिहास गवाह है कि अमेरिका की कूटनीति हमेशा से अपने सहयोगियों की पीठ में छुरा घोंपने और समझौतों से मुकरने की रही है.

ट्रंप का अस्थिर व्यवहार: आज बमबारी, कल दोस्ती का नाटक

इस तथाकथित ‘डील’ से ठीक कुछ दिन पहले तक ट्रंप ईरान पर ‘पूर्ण आत्मसमर्पण’ का दबाव बना रहे थे और भीषण बमबारी की धमकियां दे रहे थे. अचानक उनके व्यवहार में आया यह यू-टर्न कोई रणनीतिक समझदारी नहीं, बल्कि उनका वही पुराना अस्थिर रवैया (Volatile Behavior) है, जो वैश्विक मंचों पर जगजाहिर है. कल तक जो ईरान अमेरिका की नजर में ‘खलनायक’ था, आज ट्रंप के 80वें जन्मदिन के मौके पर उसे एक ‘शानदार समझौते’ में तब्दील कर व्हाइट हाउस अपनी पीठ थपथपा रहा है. कूटनीतिक विशेषज्ञों के लिए यह कोई नई बात नहीं है; ट्रंप का इतिहास रहा है कि वे पहले अपनी प्रतिबंधों और युद्ध की नीतियों से संकट पैदा करते हैं, वैश्विक अर्थव्यवस्था को गर्त में धकेलते हैं, और फिर खुद को ‘शांतिदूत’ साबित करने के लिए आधे-अधूरे समझौते की मेज पर बैठ जाते हैं.

भारत के साथ ‘दगाबाजी’ का वह काला इतिहास

अमेरिका और विशेषकर डोनाल्ड ट्रंप की दगाबाजी की फितरत को समझने के लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है. भारत इसका सबसे बड़ा भुगताभोगी रहा है. अपने पिछले कार्यकाल में ट्रंप ने भारत को ‘रणनीतिक साझेदार’ बताते हुए खूब कसमें खाई थीं, लेकिन जब बात व्यापार की आई, तो उन्होंने भारत को दिए गए जीएसपी (GSP – Generalized System of Preferences) के दर्जे को एक झटके में छीन लिया, जिससे भारतीय निर्यातकों को करोड़ों का नुकसान हुआ. इतना ही नहीं, जब भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए ईरान से सस्ता कच्चा तेल खरीद रहा था, तब इसी ट्रंप प्रशासन ने प्रतिबंधों की घुड़की देकर भारत को तेल आयात बंद करने पर मजबूर किया था, जिससे भारत के रणनीतिक हितों को भारी चोट पहुंची थी. ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नाम पर भारत जैसे गहरे मित्र देश की अर्थव्यवस्था के साथ खिलवाड़ करने वाले ट्रंप आज ईरान के साथ ईमानदारी बरतेंगे, यह सोचना ही किसी दिवास्वप्न जैसा है.

60 दिनों का जाल या फिर से युद्ध की तैयारी?

इस समझौते के बारीक ब्योरों को देखें तो वाशिंगटन और तेहरान के दावों में जमीन-आसमान का अंतर है. ईरान का कहना है कि यह समझौता तभी आगे बढ़ेगा जब अमेरिका उसके फ्रीज किए गए अरबों डॉलर के फंड जारी करेगा और प्रतिबंध हटाएगा. वहीं, अमेरिकी खेमे ने साफ कर दिया है कि फंड तुरंत रिलीज नहीं होंगे. ट्रंप ने पहले ही न्यू यॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में धमकी दे दी है कि अगर अगले 60 दिनों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंतिम सहमति नहीं बनी, तो वे दोबारा सैन्य हमले शुरू कर देंगे.

साफ है कि यह कोई स्थायी शांति नहीं, बल्कि ट्रंप द्वारा बुना गया एक कूटनीतिक जाल है ताकि वे G7 समिट में अपनी साख बचा सकें. जो नेता 2018 में ओबामा प्रशासन द्वारा की गई ऐतिहासिक ‘ईरान न्यूक्लियर डील’ (JCPOA) को एक झटके में फाड़कर फेंक सकता है, वह इस नई डील को भी अपनी सनक के चलते कभी भी कचरे के डिब्बे में डाल सकता है. ईरान को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वाशिंगटन की फितरत में धोखा है, और ट्रंप की कूटनीति में ‘भरोसा’ शब्द की कोई जगह नहीं है.

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