दिल्ली पुलिस की आधुनिक तकनीक पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। जिस फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी को अपराधियों की पहचान का हथियार माना जाता है, उसी सिस्टम ने जंतर-मंतर प्रदर्शन में कथित तौर पर ऐसे लोगों को भी संदिग्ध के रूप में चिन्हित कर दिया, जिनमें से कम से कम 25 उस समय जेल में बंद थे।
4 सितंबर 2026 को सामने आई रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली पुलिस की फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी ने जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान हत्या और दुष्कर्म के मामलों के आरोपियों की पहचान करने का दावा किया। लेकिन जांच में सामने आया कि सिस्टम द्वारा चिन्हित किए गए लोगों में कम से कम 25 व्यक्ति उस समय जेल में थे।
यह मामला अब केवल तकनीकी गड़बड़ी का नहीं, बल्कि पुलिसिंग में तकनीक के इस्तेमाल की विश्वसनीयता का बड़ा सवाल बन गया है। अगर कोई व्यक्ति जेल में है और सिस्टम उसे सड़क पर मौजूद बता रहा है, तो सवाल उठता है कि ऐसी पहचान के आधार पर किसी निर्दोष व्यक्ति को संदिग्ध ठहराने का जोखिम कितना बड़ा हो सकता है।
फेशियल रिकग्निशन सिस्टम को सुरक्षा व्यवस्था में तेजी और सटीकता के लिए इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इस घटना ने उसके डाटा, एल्गोरिद्म और सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
तकनीक अगर अपराधी पकड़ने के बजाय गलत पहचान का जाल बुनने लगे तो सवाल सिर्फ मशीन का नहीं, बल्कि उसे बिना पर्याप्त मानवीय सत्यापन के इस्तेमाल करने वाले सिस्टम का भी होगा।
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