अरुणाचल में बांध के खिलाफ भड़का ऐसा गुस्सा कि हिंसा और आगजनी तक पहुंचा मामला! NHPC के 10.91 करोड़ के PR अभियान पर भी उठे सवाल

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अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित विशाल बांध परियोजना को लेकर स्थानीय लोगों का विरोध अब गंभीर टकराव में बदलता दिखाई दे रहा है। सियांग नदी पर प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आई हैं।

इस विवाद ने अब केवल एक बांध परियोजना तक सीमित रहने के बजाय पर्यावरण, आदिवासी समुदायों के अधिकार, विस्थापन और सरकारी परियोजनाओं में जनसहमति जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।

सबसे ज्यादा चर्चा उस समय शुरू हुई जब परियोजना के पक्ष में जनसमर्थन तैयार करने के लिए NHPC द्वारा नियुक्त जनसंपर्क एजेंसी के लगभग 10.91 करोड़ रुपये के अनुबंध का मामला सामने आया।

एक तरफ सरकार इस परियोजना को राष्ट्रीय सुरक्षा, बिजली उत्पादन और विकास से जोड़कर देख रही है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय आदिवासी समुदाय के कुछ संगठन अपनी जमीन, आजीविका और सांस्कृतिक विरासत को लेकर आशंकाएं जता रहे हैं।

आखिर क्यों हो रहा है बांध का विरोध?

अरुणाचल प्रदेश के सियांग क्षेत्र में प्रस्तावित यह परियोजना देश की बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में शामिल है।

सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट की प्रस्तावित क्षमता 11,200 मेगावाट बताई गई है। इस परियोजना को लेकर सरकार और NHPC की ओर से अलग-अलग स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं।

लेकिन स्थानीय आदिवासी समुदाय के कुछ हिस्सों में इस परियोजना को लेकर लंबे समय से विरोध रहा है।

विरोध करने वाले लोगों की प्रमुख चिंता यह है कि बांध बनने की स्थिति में बड़े भूभाग पर असर पड़ सकता है। पारंपरिक जमीन, कृषि क्षेत्र, बागवानी, पशुपालन और नदी पर आधारित आजीविका प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि सियांग नदी केवल पानी का स्रोत नहीं है, बल्कि उनके जीवन, संस्कृति और आर्थिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यदि परियोजना के कारण जमीन डूब क्षेत्र में आती है, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ सकता है।

शुक्रवार की रात बिगड़े हालात

शुक्रवार को विरोध प्रदर्शन के दौरान तनाव बढ़ गया था। इसके बाद शनिवार की शुरुआती घंटों तक हालात गंभीर बने रहे।

अरुणाचल प्रदेश के ईस्ट सियांग जिले के पासीघाट में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई गई।

रिपोर्ट के मुताबिक, गेकू क्षेत्र में प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा बलों की तैनाती वापस लेने और प्रस्तावित परियोजना को रद्द करने की मांग की।

इस दौरान सुरक्षा कर्मियों की ओर से आंसू गैस के गोले छोड़े जाने की जानकारी भी सामने आई।

इसके बाद पासीघाट में कुछ समूहों के प्रदर्शन के दौरान आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं हुईं।

NHPC के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, कंपनी के एक कार्यालय को पूरी तरह नुकसान पहुंचा, जबकि दूसरे कार्यालय को भी आंशिक क्षति हुई। एक जनरेटर सेट को भी नुकसान पहुंचाया गया।

घटना के बाद क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई।

प्रशासन ने लगाई पाबंदी

ईस्ट सियांग जिले की जिलाधिकारी जयन्ती पर्टिन ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि रविवार तक कानून व्यवस्था की स्थिति नियंत्रण में थी।

हालांकि, पासीघाट, मेबो और रुक्सिन क्षेत्रों में BNSS की धारा 163 के तहत सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध जारी रखने की बात कही गई।

प्रशासन का उद्देश्य क्षेत्र में शांति बनाए रखना और किसी नई अप्रिय घटना को रोकना है।

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भी पूरे घटनाक्रम पर चिंता जताई और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की बात कही।

मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर कहा कि परियोजना को लेकर गलतफहमियां और सूचनाओं की कमी लोगों के मन में आशंकाएं पैदा कर रही हैं। उन्होंने तथ्यों, पारदर्शिता और खुली बातचीत के माध्यम से इन आशंकाओं को दूर करने पर जोर दिया।

10.91 करोड़ का PR अभियान क्यों बना चर्चा का विषय?

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू NHPC की जनसंपर्क रणनीति है।

NHPC ने जुलाई 2025 में मुंबई की कॉन्सेप्ट पब्लिक रिलेशंस एजेंसी को एक वर्ष के लिए लगभग 8.73 करोड़ रुपये का अनुबंध दिया था।

बाद में इस अनुबंध को तीन महीने के लिए बढ़ाया गया। इसके बाद इसकी कुल कीमत लगभग 10.91 करोड़ रुपये हो गई।

इस जनसंपर्क अभियान का उद्देश्य परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर समर्थन तैयार करना और लोगों तक इसके पक्ष में जानकारी पहुंचाना था।

रिपोर्ट के मुताबिक, एजेंसी की रणनीति में स्थानीय समुदाय के बुजुर्गों, धार्मिक प्रतिनिधियों, युवाओं, सामाजिक संगठनों, स्कूल प्रमुखों और अन्य प्रभावशाली लोगों के साथ संपर्क स्थापित करना शामिल था।

इसके अलावा मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और जनसंवाद के माध्यम से परियोजना की सकारात्मक छवि प्रस्तुत करने की योजना भी बनाई गई थी।

यही वजह है कि हिंसक विरोध के बीच इस अनुबंध पर भी सवाल उठने लगे हैं।

क्या लोगों को समझाने के बजाय प्रचार पर ज्यादा जोर दिया गया?

इस परियोजना के विरोध का एक बड़ा सवाल जनसहमति से जुड़ा हुआ है।

किसी भी बड़ी परियोजना को लागू करने से पहले प्रभावित होने वाले लोगों को उसकी पूरी जानकारी देना, उनकी चिंताओं को सुनना और उचित समाधान प्रस्तुत करना बेहद जरूरी होता है।

यदि लोगों को विस्थापन, जमीन के नुकसान और आजीविका को लेकर आशंका है, तो केवल प्रचार अभियान चलाने से इन समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता।

स्थानीय समुदायों को यह भरोसा होना चाहिए कि उनकी जमीन, संस्कृति और अधिकारों की रक्षा की जाएगी।

NHPC का पक्ष है कि जनसंपर्क एजेंसी को परियोजना से जुड़ी वास्तविक जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए नियुक्त किया गया था।

वहीं विरोध करने वाले लोगों की मांग है कि उनकी चिंताओं को गंभीरता से सुना जाए।

इसलिए यह विवाद केवल एक जनसंपर्क अनुबंध की कीमत का मामला नहीं है, बल्कि विकास परियोजनाओं में स्थानीय लोगों की भागीदारी और भरोसे का भी प्रश्न है।

सरकार के सामने राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय अधिकारों की चुनौती

सरकार इस परियोजना को चीन की ओर से ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपरी हिस्से में बनाई जा रही विशाल जलविद्युत योजनाओं के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण मानती है।

सियांग नदी का रणनीतिक महत्व है और जल संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर भारत की चिंताएं लंबे समय से चर्चा में रही हैं।

लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क के साथ-साथ स्थानीय समुदायों की चिंताओं को भी महत्व देना होगा।

अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित यह परियोजना अभी पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन के चरण में बताई गई है। ऐसे में आगे की प्रक्रिया में तकनीकी, पर्यावरणीय और सामाजिक पहलुओं की जांच महत्वपूर्ण होगी।

फिलहाल मुख्यमंत्री की बातचीत की पेशकश, प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था और NHPC के अभियान पर सबकी नजर है।

अब आगे क्या होगा?

सियांग परियोजना का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार स्थानीय लोगों के साथ किस तरह संवाद स्थापित करती है।

यदि प्रभावित समुदायों की आशंकाओं का समाधान नहीं किया गया, तो विरोध और तेज हो सकता है।

दूसरी तरफ परियोजना को राष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक और ऊर्जा संबंधी महत्व के साथ देखा जा रहा है।

ऐसे में सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ विकास और राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाना, दूसरी तरफ आदिवासी समुदायों की जमीन, पर्यावरण और आजीविका की रक्षा करना।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि इस पूरी प्रक्रिया में हिंसा के बजाय संवाद और कानूनी प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जाए।

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