चुनाव आयोग के पास ऐसा क्या है, जिसे जनता से छिपाया जा रहा है? SIR सॉफ्टवेयर पर उठे बड़े सवाल!

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चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। मतदाता सूची में गड़बड़ियों की पहचान करने के लिए इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर की जानकारी मांगने पर आयोग ने ऐसा जवाब दिया है, जिसने राजनीतिक गलियारों से लेकर चुनावी पारदर्शिता पर नजर रखने वाले लोगों तक नई बहस छेड़ दी है। सवाल सीधा है कि जिस तकनीक का इस्तेमाल देश के करोड़ों मतदाताओं के नाम और पहचान से जुड़े रिकॉर्ड की जांच में हो रहा है, उसके बारे में आम नागरिक को जानकारी क्यों नहीं मिल सकती?

भारतीय निर्वाचन आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) के दौरान मतदाता सूची में त्रुटियों और विसंगतियों की पहचान के लिए इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर का नाम और उसका वर्जन सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है। आयोग ने सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी को व्यावसायिक गोपनीयता, व्यापारिक रहस्य और बौद्धिक संपदा से जुड़ा बताते हुए RTI अधिनियम की धारा 8(1)(d) का हवाला दिया है।

मामला तेलंगाना के करीमनगर निवासी सामाजिक कार्यकर्ता एमए मुजीब अय्यूब की ओर से दायर RTI आवेदन से जुड़ा है। उन्होंने यह जानना चाहा था कि मतदाताओं के डेटा में गलतियों की पहचान करने के लिए किस सॉफ्टवेयर, एप्लीकेशन या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या सॉफ्टवेयर अपने आप किसी मतदाता के रिकॉर्ड को संदिग्ध बताकर जांच, सुधार या नाम हटाने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि क्या इस प्रक्रिया में AI, मशीन लर्निंग या प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स जैसी तकनीकों का इस्तेमाल हुआ? अगर किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से संदिग्ध श्रेणी में चला जाता है, तो उसकी सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था है? और अंतिम निर्णय कौन लेता है?

आयोग ने जवाब में कहा कि SIR के लिए कोई नया सॉफ्टवेयर विकसित या खरीदा नहीं गया है। आयोग के मुताबिक मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम शामिल करने या हटाने का निर्णय संबंधित विधानसभा क्षेत्र के Electoral Registration Officer यानी ERO के अधिकार क्षेत्र में आता है।

हालांकि, सॉफ्टवेयर की पहचान और संस्करण से संबंधित जानकारी साझा नहीं की गई। स्वचालित तरीके से रिकॉर्ड चिह्नित किए जाने, AI के इस्तेमाल और गलत पहचान से बचाव के उपायों से जुड़े कुछ सवालों को आयोग ने स्पष्टीकरण की श्रेणी में रखा, जिसे RTI कानून के तहत सूचना देने की बाध्यता से अलग बताया।

यही वह बिंदु है जहां विवाद और गहरा जाता है। चुनाव आयोग केवल एक सामान्य सरकारी विभाग नहीं है। उसके फैसलों का सीधा असर लोकतंत्र की सबसे बुनियादी प्रक्रिया यानी मतदान पर पड़ता है। मतदाता सूची में नाम होना किसी नागरिक के मतदान अधिकार के इस्तेमाल की पहली शर्त है। ऐसे में तकनीकी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

रिपोर्ट में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत का भी पक्ष सामने आया है। उन्होंने आवेदक को सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपील करने की सलाह दी है। यानी इस मामले में सूचना प्राप्त करने का कानूनी रास्ता अभी खुला हुआ है।

SIR को लेकर पहले से ही राजनीतिक विवाद चल रहा है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट में मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने और चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर उठे सवालों का भी उल्लेख किया गया है। आयोग ने दूसरी ओर अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म को सुरक्षित बताते हुए कहा है कि मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित होती है।

यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा। सॉफ्टवेयर की जानकारी सार्वजनिक न करना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं। लेकिन जब करोड़ों नागरिकों के मतदान अधिकार से जुड़ा मामला हो, तब पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

देश में चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता केवल मतदान के दिन तक सीमित नहीं होती। मतदाता सूची तैयार करने से लेकर उसमें सुधार और नाम हटाने तक हर चरण पर जनता का भरोसा जरूरी है। यदि तकनीकी व्यवस्था का इस्तेमाल किया जा रहा है तो उसके नियम, सुरक्षा और जवाबदेही को लेकर स्पष्टता भी होनी चाहिए।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चुनाव आयोग अपने फैसले और तकनीकी प्रक्रिया को लेकर उठ रहे संदेहों का विस्तृत जवाब देगा या यह विवाद RTI और कानूनी अपीलों के बीच ही उलझा रहेगा? फिलहाल आयोग का जवाब सामने है, लेकिन पारदर्शिता को लेकर उठे सवालों का पूरा समाधान नहीं हुआ है।

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