मुरिया दरबार में राष्ट्रपति मुर्मु का बड़ा संदेश, बोलीं- मैं भी मांझी की बेटी हूं!

बस्तर दशहरा के ऐतिहासिक मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आदिवासी समाज की समृद्ध संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक व्यवस्था की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था सामाजिक एकता, न्याय, आपसी सहयोग और सुशासन का बेहतरीन उदाहरण है। समय के साथ शासन व्यवस्था और कानून बदलते रहे, लेकिन आदिवासी समाज ने अपनी परंपराओं और सामाजिक नियमों को पीढ़ियों से सहेजकर रखा है।
मुरिया दरबार में आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों और पारंपरिक प्रमुखों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने अपने परिवार की परंपरा का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वह स्वयं आदिवासी संस्कृति से आती हैं। उनके दादाजी, पिताजी और भाई भी मांझी रहे हैं। उन्होंने गर्व से कहा, “मैं एक मांझी की बेटी हूं, गांव के मुखिया की बेटी हूं।”
राष्ट्रपति ने कहा कि आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था किसी लिखित पुस्तक या संविधान में दर्ज नहीं है, लेकिन पीढ़ियों से लोग इसका पालन करते आ रहे हैं। गांवों में मांझी और बुजुर्गों की अगुवाई में विवादों का समाधान आपसी बातचीत और सहमति से किया जाता रहा है। पीड़ परगना और देश परगना जैसी संस्थाएं भी इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं।
उन्होंने बताया कि पहले लगभग 50 से 52 गांवों को मिलाकर एक पीड़ की व्यवस्था होती थी। बड़े विवादों को सुलझाने के लिए समाज के लोग सात से आठ दिनों तक सामूहिक बैठकें करते थे। यह परंपरा आदिवासी समाज की एकता और आपसी विश्वास को दर्शाती है।
राष्ट्रपति ने आधुनिक न्यायिक व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि कई मामलों में न्याय मिलने में वर्षों लग जाते हैं। ऐसे में जहां कानून अनुमति देता हो, वहां आपसी संवाद और सहमति से विवाद सुलझाने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने आदिवासी समाज से बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने और विकास के नए अवसर अपनाने की अपील की। साथ ही कहा कि आधुनिकता और विकास की राह पर आगे बढ़ते हुए अपनी संस्कृति, परंपराओं और पहचान को नहीं भूलना चाहिए।
राष्ट्रपति ने मुरिया दरबार जैसी ऐतिहासिक परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का आह्वान किया। इस अवसर पर राज्यपाल रमेन डेका, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सहित अनेक जनप्रतिनिधि और आदिवासी समाज के पारंपरिक प्रमुख मौजूद रहे।
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