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छग में इनसे है रियासत की सियासत,राजघराने के नेताओं का सत्ता में कितना दखल ?

नमस्कार दोस्तों, फोर्थ आई न्यूज़ में आप सभी का एक बार फिर से स्वागत है। दोस्तों देश की आजादी के बाद जब रियासतों का विलय हुआ, तब छत्तीसगढ़ में 14 रियासतें थीं। राजपरिवार सक्रिय रूप से राजनीति में थे या फिर हार-जीत का समीकरण महल से तय हुआ करता था। लेकिन समय के साथ जनता ने राजाओं के किले में सेंध लगाई। अब हालात ये हैं कि छत्तीसगढ़ में कुछ राजपरिवार ही राजनीति में सक्रिय हैं, जबकि बाकी राजपरिवारों का संन्यास हो चुका है या अपनी आभा खो चुके हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद रियासतों के प्रभाव वाले कई क्षेत्र एक-एक कर अनुसूचित जाति या जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित होते गए और रियासतों के वारिस सत्ता की दौड़ से बाहर चले गए। छत्तीसगढ़ में इन राजपरिवारों का शासन रहा है | उदयपुर (धरमजयगढ़) राजनांदगांव, सरगुजा, रायगढ़, सारंगढ़, खैरागढ़, छुईखदान, कोरिया, चांग भखार (सरगुजा जिले में) जशपुर, कवर्धा, कांकेर, बस्तर, सक्ती, बस्तर सबसे बड़ी (1306 वर्ग मील) और सक्ती सबसे छोटी (138 वर्ग मील) रियासत

आइए अब नज़र डालते हैं प्रमुख राजघराने से निकले नेताओं पर

सारंगढ़: सिर्फ 13 दिनों के लिए सीएम बने थे नरेशचंद्र
सारंगढ़ रियासत के राजा नरेश चन्द्र सिंह 1952 के पहले चुनाव में सारंगढ़ से विधायक बने थे। इसके बाद भी तीन बार वे विधायक बने। इस बीच वे एक बार 13 दिनों के लिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। उनकी बेटियां कमला देवी, रजनीगंधा और पुष्पादेवी सिंह भी राजनीति में आईं। मगर अब इस राजपरिवार की कोई आवाज़ छत्तीसगढ़ की सियासत में सुनाई नहीं देती।

कोरिया: कुमार साहब के साथ गुम हुई आवाज
सरगुजा से लगे हुए कोरिया राजघराने के रामचंद्र सिंहदेव 1967 में विधानसभा चुनाव जीतकर संविद सरकार में 16 विभागों के मंत्री बने। फिर वे 6 बार चुनाव जीतकर अविभाजित मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में मंत्री रहे। चुनाव में शराब नहीं बांटने का प्रण लेकर राजनीति से संन्यास ले लिया। आज उनके परिवार के किसी भी सदस्य का नाम सक्रीय राजनीती में नहीं है।

बस्तर: राजनीति से दूर हुआ परिवार
60 साल बाद बस्तर राजपरिवार सक्रिय राजनीति में उतरने की तैयारी में है। युवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष कमलचंद भंजदेव ने 2018 के विधानसभा चुनाव में अपनी भी दावेदारी पेश की मगर सफल नहीं हो पाए। उनके पिता प्रवीरचंद भंजदेव 1957 में विधायक बने थे, लेकिन उनके निधन के बाद परिवार राजनीति से दूर हो गया। और अब यह परिवार केवल राजदरबार तक ही सीमित है।

जशपुर: जूदेव नहीं रहे, परिवार ने संभाली कमान
जशपुर का जूदेव परिवार राजनीति में पूरे दमखम से डटा है। मूंछों पर ताव देकर दो दशक तक सक्रिय रहे दिलीप सिंह जूदेव के खामोश होने के बाद परिवार के सदस्य भी भाजपा की राजनीति में आपातकाल से गुजर रहे हैं। उनके बेटे युद्धवीर सिंह उग्र बयानों के कारण विवादों में हैं।

खैरागढ़: जोगी कांग्रेस जुड़े थे स्व देवव्रत
कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राजनांदगांव से सांसद रह चुके स्व देवव्रत सिंह निराशाजनक ढंग से पार्टी से अलग हो गए। फिर उन्होनें जोगी कांग्रेस की पतवार के सहारे सियासी नाव खेने की जद्दोजहद की। खैरागढ़ राजपरिवार के देवव्रत कांग्रेस से तीन बार विधायक रहे। वे 2018 में भी खैरागढ़ से चुनाव लड़े और जीते भी मगर उनका निधन हो जाने के बाद इस सीट पर उपचुनाव हुए लेकिन राजघराने से किसी सदस्य ने चुनाव नहीं लड़ा, लिहाज़ा अब यह सीट कांग्रेस के पास है, पार्टी की यशोदा वर्मा यहाँ से वर्तमान विधायक हैं।

सरगुजा: सिंहदेव सक्रिय राजनीति में
इस रियासत के शासक चंडीकेश्वर शरण सिंहदेव पहली बार 1952 में विधायक बने थे। अब टीएस सिंहदेव इस रियासत को आगे बढ़ा रहे हैं। राजपरिवारों में सबसे मजबूत स्थिति में सरगुजा राजपरिवार के टीएस सिंहदेव हैं, जो विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष भी रह चुके हैं। कांग्रेस ने उन्हें साल 2018 में जन घोषणा पत्र समिति का अध्यक्ष बनाया था। वे खेत से बाजारों तक ग्रामीणों से मिलते रहे हैं। वर्तमान में वो प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री का दायित्व निभा रहे हैं।

तो इस तरह से फिलहाल टीएस बाबा ही प्रदेश के एकमात्र ऐसे सक्रीय राजनेता हैं जो राजघराने से ताल्लुक रखते हैं। दोस्तों, क्या इस साल के विधानसभा चुनाव में भी टीएस बाबा अपनी यह रियासत बरक़रार रख पाएंगे ? और क्या कुछ और राजघरानों से भी इस बार दावेदारी देखने को मिल सकती है ? राजपरिवार के सदस्यों का राजनीति में आना इसे आप कितना प्रभावी मानते हैं

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