बांग्लादेश में बिगड़ती सुरक्षा, भारत ने राजनयिकों के परिवारों को लौटाने की तैयारी की

पिछले करीब एक साल से बांग्लादेश के हालात लगातार अस्थिर बने हुए हैं। इस अस्थिरता का असर अब भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी साफ नजर आने लगा है। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि बांग्लादेश में न केवल हिंदू अल्पसंख्यक, बल्कि भारतीय राजनयिक और उनके परिवार भी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं। इसी को देखते हुए भारत सरकार ने बड़ा और एहतियाती कदम उठाने का मन बनाया है।
बढ़ती चरमपंथी और कट्टरपंथी गतिविधियों ने भारतीय विदेश मंत्रालय की चिंता बढ़ा दी है। हालात की गंभीरता को समझते हुए मंत्रालय ने बांग्लादेश में तैनात भारतीय अधिकारियों के परिवारों और आश्रितों को भारत लौटने की सलाह दी है। यह फैसला बांग्लादेश में प्रस्तावित संसदीय चुनावों से कुछ हफ्ते पहले लिया गया है, ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।
हालांकि, भारत अपने राजनयिक मिशनों को फिलहाल बंद नहीं कर रहा है। ढाका स्थित उच्चायोग के साथ-साथ चटगांव, खुलना, राजशाही और सिलहट में मौजूद भारतीय मिशन काम करते रहेंगे। अधिकारियों की तैनाती जारी रहेगी, लेकिन इसे “नॉन-फैमिली पोस्टिंग” के रूप में देखा जा रहा है, जो आमतौर पर अस्थिर और संवेदनशील देशों में लागू की जाती है।
भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन और मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के सत्ता में आने के बाद से बढ़ा है। इसी बीच बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में भी तेजी आई है। छात्र नेता शरीफ ओसमान हादी की मौत के बाद हालात और बिगड़ गए।
भारत ने इन घटनाओं पर गहरी चिंता जताते हुए बांग्लादेश सरकार से सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साफ कहा कि अल्पसंख्यकों, उनके घरों और व्यवसायों पर हो रहे बार-बार के हमले एक चिंताजनक पैटर्न की ओर इशारा करते हैं। भारत का मानना है कि ऐसी घटनाओं को नजरअंदाज करना अपराधियों का मनोबल बढ़ाता है और अल्पसंख्यकों में भय व असुरक्षा की भावना को और गहरा करता है।


