तेहरान की हुंकार और वाशिंगटन की आर्थिक बर्बरता

फारस की खाड़ी का स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) इस वक्त बारूद के ढेर पर बैठा है और वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा रणक्षेत्र बन चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ललकारने वाले तेवरों और वहां तैनात अमेरिकी नौसेना के ‘स्टील वॉल’ पहरे ने ईरान को चारों खाने चित्त करने का चक्रव्यूह रच दिया है। क्या यह कूटनीति की नाकामी है या तीसरे विश्व युद्ध की खौफनाक शुरुआत? सवाल यह है कि इस नग्न अमेरिकी दादागिरी के आगे तेहरान कब तक टिक पाएगा?
वैश्विक व्यापार का गला घोंट रही अमेरिकी नौसेना, जहाजों की आवाजाही ठप
पारंपरिक रूप से जहां रोजाना 130 से 140 कमर्शियल जहाजों का बेधड़क आना-जाना हुआ करता था, वहीं अब यह आंकड़ा घटकर मात्र 8-9 जहाजों पर सिमटकर रह गया है। अमेरिकी नौसेना की इस आक्रामक घेराबंदी ने वैश्विक समुद्री व्यापार को आईसीयू में पहुंचा दिया है। ओमान के तट पर एक संदेहास्पद रूसी टैंकर में हुए रहस्यमयी विस्फोट ने इस सुलगते शोले में घी डालने का काम किया है।
अमेरिका सीना ठोककर दावा कर रहा है कि उसने होर्मुज के हर चप्पे पर पूर्ण नियंत्रण कस लिया है और वह इस समुद्री धमनियों को अपने कब्जे से नहीं छोड़ेगा।
दूसरी तरफ, ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड के कड़े तेवर बता रहे हैं कि वे अपनी आखिरी सांस तक अमेरिकी आक्रामकता को चुनौती देते रहेंगे।
ओमान की कमजोर मध्यस्थता और दिखावटी शांति वार्ताओं के बीच जमीन पर केवल बारूद की गंध और मिसाइलों की सरसराहट बची है।
ट्रंप प्रशासन ईरान की तबाही के कगार पर खड़ी अर्थव्यवस्था और बेलगाम महंगाई का फायदा उठाकर उसे घुटनों पर लाने की गंदी चाल चल रहा है।
क्या अमेरिका की यह सैन्य छाती ठोकने वाली घेराबंदी ईरान को हमेशा के लिए नेस्तनाबूद कर देगी, या यह जिद पूरी दुनिया को एक भयंकर वैश्विक ऊर्जा संकट और महाविनाश की आग में झोंक देगी?




