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आखिर किस जाती के थे अजीत जोगी? मरने के बाद भी जारी है विवाद!

राजनीति में चेहरे बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं, लेकिन कुछ सवाल कभी नहीं बदलते। छत्तीसगढ़ की सियासत का सबसे बड़ा और सबसे पेचीदा सवाल रहा है कि अजीत जोगी की असली जाति क्या थी? प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री, एक रसूखदार नौकरशाह और एक ऐसे नेता जिन्होंने मरते दम तक अपनी आदिवासी पहचान की लड़ाई लड़ी। आज फोर्थ आई की इस स्पेशल रिपोर्ट में हम उन फाइलों को खोलेंगे जो 20 साल तक अदालतों की धूल फांकती रहीं। जानेंगे उस हाई पावर कमेटी की कड़वी सच्चाई और वो कानूनी मोड़ जिसने एक पूरे राजनीतिक खानदान के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया।

साल 2001, छत्तीसगढ़ एक नया राज्य बना और राज्य को मिला अपना पहला मुख्यमंत्री—अजीत प्रमोद कुमार जोगी। लेकिन जैसे ही उन्होंने ‘कंवर’ आदिवासी के तौर पर मरवाही सीट से अपनी दावेदारी पेश की, विरोध के सुर उठने लगे। भाजपा नेता संतकुमार नेताम ने एक ऐसा दावा किया जिसने जोगी के पूरे करियर को विवादों में घेर लिया। दावा था कि जोगी ‘आदिवासी’ नहीं बल्कि ‘सतनामी’ (SC) समुदाय से ताल्लुक रखते हैं।

यह मामला सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी नहीं रहा, बल्कि देश की सबसे बड़ी अदालत तक जा पहुँचा। 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने एक नजीर पेश करते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया कि एक ‘हाई पावर सर्टिफिकेट स्क्रूटनी कमेटी’ बनाई जाए। इस कमेटी का काम था जोगी के पूर्वजों के रिकॉर्ड, उनकी वंशावली और जमीनी दस्तावेजों की बारीकी से जांच करना। लेकिन यह प्रक्रिया रमन सिंह सरकार और जोगी के बीच शह-मात के खेल में सालों तक उलझी रही।

2018 में छत्तीसगढ़ की सत्ता बदली और भूपेश बघेल की सरकार आई। इस सरकार ने ‘जाति विवाद’ की फाइल को फिर से खोला। अगस्त 2019 में डीडी सिंह की अध्यक्षता वाली कमेटी ने अंतिम रिपोर्ट दी। फैक्ट: कमेटी ने जोगी के आदिवासी प्रमाण पत्र को निरस्त कर दिया। इम्पैक्ट: इसी रिपोर्ट के आधार पर बिलासपुर के सिविल लाइंस थाने में जोगी के खिलाफ धोखाधड़ी की धारा 420 के तहत मामला दर्ज हुआ। यह जोगी के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा कानूनी झटका था।

मई 2020 में अजीत जोगी दुनिया छोड़ गए, लेकिन विवाद उनके पीछे ही रह गया। आज 2026 में, उनके बेटे अमित जोगी और बहू ऋचा जोगी इसी पहचान की लड़ाई लड़ रहे हैं। चूंकि पिता की जाति ही संतानों का आधार होती है, इसलिए अमित जोगी का जाति प्रमाण पत्र भी रद्द किया गया, जिसके चलते वे मरवाही उपचुनाव से बाहर हो गए।

मामला अब भी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के बीच झूल रहा है। शासन की ओर से 1950 के पूर्व के दस्तावेजों की मांग की जा रही है, जो जोगी परिवार के पास मौजूद नहीं होने का दावा किया जा रहा है। अजीत जोगी कहते थे कि ‘मैं आदिवासी हूँ और आदिवासी ही मरूंगा’, लेकिन विडंबना देखिए कि उनकी मृत्यु के सालों बाद भी सिस्टम और कानून इस पर मुहर लगाने को तैयार नहीं हैं। यह सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि उस संवैधानिक व्यवस्था की भी लड़ाई है जहाँ एक सर्टिफिकेट आपकी पूरी जिंदगी की सच्चाई तय कर देता है। सवाल तो अब भी बरक़रार है कि क्या आने वाले समय में जोगी परिवार अपनी खोई हुई पहचान वापस पाएगा? क्या कभी मुख्यधारा की सियासत में इस विवाद से उबरकर एक बार फिर जोगी नाम अपनी खोयी हुई साख वापस पा पाएगा? कमेंट्स में अपनी राय जरूर बताएं।

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