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क्या इस बार इस अपनी विधानसभा की साख बचा पाएंगे डॉ रमन ?

क्या होगा आगे राजनितिक भविष्य ?

नमस्कार दोस्तों, फोर्थ आई न्यूज़ में आप सभी का एक बार फिर से स्वागत है। दोस्तों हमारी विधानसभा की स्पेशल सीरीज़ को आप सभी का भरपूर प्यार मिल रहा है इसके लिए आपका दिल से आभार, हम समय-समय पर हमारे दर्शकों की डिमांड का ध्यान रखते हुए इस सीरीज़ में अलग-अलग विधानसभाओं को लेकर स्पेशल रिपोर्ट तैयार करते हैं और आज इसी कड़ी में हम बात करने जा रहे हैं हमारे प्रदेश की सबसे हाईप्रोफाइल सीट में से एक माने जाने वाली राजनंदगांव विधानसभा सीट की।

राजनांदगांव विधानसभा सीट एक सामान्य सीट है। यह सीट राजनंदगांव लोकसभा सीट का हिस्सा है, जो केंद्रीय इलाके में पड़ता है। पिछले सेंसस के मुताबिक इस सीट पर कुल वोटों की संख्या 1 लाख 80 हज़ार 300 है। यह सीट अब छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह का अपराजित गढ़ मानी जाती है ,मगर शुरुआत से ही ऐसा नहीं था। जब साल 2003 में हमारे प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए तब राजनांदगांव विधानसभा सीट पर कांग्रेस के उदय मुदलियार ने 43 हज़ार 081 वोटों से जीत दर्ज की थी, उन्होंने बीजेपी के लीलाराम भोजवानी को हराया था जिन्हें कुल 43 हज़ार 041 वोट मिले थे, आप देखिए कि जीत का अंतर् महज़ 40 वोट का था। और इस तरह यह सीट कांग्रेस के कब्ज़े में आई। हलाकि यह वही साल था जब डॉ रमन सिंह की ताजपोशी बतौर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के तौर पर हुई थी।

इसके बाद साल 2008 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अपना प्रत्याशी बदलते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह को इस सीट से टिकट दिया, वहीं कांग्रेस ने अपने सिटिंग एमएलए उदय मुदलियार को चुनावी मैदान में उतारा, उस चुनाव में यह पहली बार था जब डॉ रमन सिंह राजनांदगांव से जीतकर विधायक बने उन्हें 77 हज़ार 230 वोट मिले थे, जबकि तत्कालीन कांग्रेस विधायक उदय मुदलियार के पाले में सिर्फ 44 हज़ार 841 वोट ही आ पाए।

फिर आया 2013 का विधानसभा चुनाव। उस समय छत्तीसगढ़ में झीरम घाटी नक्सली हमला हुआ था जिसमें कांग्रेस के पूर्व विधायक उदय मुदलियार भी शहीद हो गए थे। कांग्रेस ने सहानुभूति लहार को भुनाने के मकसद से राजनांदगांव सीट से पूर्व विधायक उदय मुदलियार की पत्नी अल्का उदय मुदलियार को इस टिकट दिया, वहीं बीजेपी ने अपना प्रत्याशी पिछले चुनावों की तरह बरक़रार रखा और तत्कालीन सीएम डॉ रमन सिंह को दोबारा मौका दिया। उस चुनाव में रमन सिंहको कुल 86 हज़ार 797 वोट मिले थे वहीं अलका उदय मुदलियार महज़ 50 हज़ार 931 वोटों तक ही सिमट गईं और कांग्रेस सहानुभूति वोट नहीं हासिल कर पाई।

साल 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने लगातार तीसरी बार राजनांदगाव सीट से तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह पर जीत का विश्वास जताते हुए उन्हें प्रत्याशी बनाया और बीजेपी का यह विश्वास एक बार फिर रंग लाया। डॉ रमन सिंह ने ने यहां से चुनावी जीत की हैट्रिक लगाई। साल 2018 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी स्व करुणा शुक्ला को हराया, आपको बता दें कि स्व करुणा पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी थीं। उस चुनाव में डॉ रमन सिंह को 80 हज़ार 589 वोट मिले जबकि करुणा को 63 हज़ार 656 वोट ही हासिल हो पाए। मगर इस बड़ी लीड के बावजूद डॉ रमन सिंह इस विधानसभा से विधायक तो बन गए मगर अपनी सीएम की कुर्सी नहीं बचा पाए।

क्योंकि साल 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने प्रदेश की 90 विधानसभाओं में एक तिहाई बहुमत से जीतकर सरकार बनाई और सीएम का पद तत्कालीन पीसीसी चीफ भूपेश बघेल को मिला। दोस्तों, वर्तमान में यदि देखा जाए तो बीजेपी में डॉ रमन सिंह को प्रदेश स्तर पर कोई बड़ा पद या बड़ी ज़िम्मेदारी नहीं मिली है, हलाकि पार्टी ने उन्हें राष्ट्रिय उपाध्यक्ष ज़रूर बनाया है लेकिन इस साल के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनाव में क्या उन्हें पार्टी राजनांदगांव विधानसभा सीट से दोबारा मौका देगी और क्या बीजेपी उन्हें एक बार फिर सीएम फेस के तौर पर प्रोजेक्ट करेगी ? ऐसा होना हमें तो मुश्किल ही लगता है क्योंकि डॉ रमन सिंह अब काफी वरिष्ठ हो चुके हैं कांग्रेस तो यह भी कहती है कि डॉ रमन सिंह को अब राजनीती से सन्यास ले लेना चाहिए।

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