ट्रंप के दबदबे को खुली चुनौती: अमेरिकी प्रतिबंधों को ठेंगा दिखाकर भारत ने कैसे जीती ईरान की जंग

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त विदेश नीति और आक्रामक प्रतिबंधों के आगे दुनिया के कई देश घुटने टेक देते हैं। लेकिन भारत ने अपनी मजबूत कूटनीति के दम पर यह साबित कर दिया है कि नई दिल्ली को डराना नामुमकिन है। ईरान के मामले में अमेरिका की सीधी धमकियों और ‘मैक्सिमम प्रेशर’ (अधिकतम दबाव) नीति के बावजूद, भारत ने न केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा की, बल्कि वॉशिंगटन को अपनी शर्तों पर झुकने के लिए भी मजबूर कर दिया।
अमेरिकी आक्रामकता पर भारी भारतीय कूटनीति
ट्रंप प्रशासन ने जब ईरान पर अब तक के सबसे कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए, तो उसका उद्देश्य ईरान को पूरी दुनिया से अलग-थलग करना था। अमेरिका का साफ संदेश था—”जो देश ईरान से व्यापार करेगा, वह अमेरिका का दुश्मन होगा।” भारत के लिए यह एक बड़ी परीक्षा थी, क्योंकि ईरान उसका रणनीतिक साझेदार और तेल का बड़ा स्रोत था।
अमेरिका के इस सीधे टकराव वाले रवैये के बाद भी भारत अपनी नीति पर अडिग रहा। भारत ने अमेरिकी दबाव के सामने झुकने से साफ इनकार कर दिया और अपनी संप्रभुता को सर्वोपरि रखा।
चाबहार बंदरगाह: वॉशिंगटन को झुकना पड़ा
भारत की इस जीत का सबसे बड़ा प्रतीक चाबहार बंदरगाह है।
- रणनीतिक महत्व: यह बंदरगाह पाकिस्तान को बाईपास करके अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत की सीधी पहुंच बनाता है।
- अमेरिकी सरेंडर: भारत ने अमेरिका को साफ शब्दों में समझा दिया कि चाबहार परियोजना से कोई समझौता नहीं होगा। नतीजा यह हुआ कि आक्रामक ट्रंप प्रशासन को भारत के लिए विशेष छूट (Waiver) देनी पड़ी।
- भू-राजनीतिक जीत: अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों के बीच भी चाबहार बंदरगाह का काम चलता रहा, जो भारतीय विदेश नीति की एक ऐतिहासिक जीत है।
डॉलर को दरकिनार: ‘रुपया-रियाल’ व्यापार तंत्र
जब अमेरिका ने ईरान को वैश्विक बैंकिंग प्रणाली (SWIFT) से बाहर कर दिया, तो भारत ने इसका भी तोड़ निकाल लिया।
- भारत और ईरान ने डॉलर को छोड़कर रुपया-रियाल व्यापार तंत्र (Vostro Account) शुरू किया।
- इससे भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन किए बिना ईरान से कच्चे तेल का आयात जारी रखा।
- इस कदम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को सीधी चुनौती दी।
भारत पर क्यों बेअसर रहे ट्रंप के हंटर?
अमेरिका चाहकर भी भारत पर कड़े आर्थिक एक्शन नहीं ले पाया। इसके पीछे ठोस रणनीतिक कारण थे:
- चीन का डर: अमेरिका को एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत की सख्त जरूरत है।
- बड़ा बाजार: अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक है, जिसे वॉशिंगटन खो नहीं सकता।
- इंडो-पैसिफिक साझेदारी: ‘क्वाड’ (QUAD) और इंडो-पैसिफिक रणनीति में भारत की केंद्रीय भूमिका के कारण अमेरिका भारत को नाराज करने का जोखिम नहीं ले सकता था।
ईरान के मुद्दे पर भारत ने दिखा दिया कि समकालीन वैश्विक राजनीति में वह किसी का ‘जूनियर पार्टनर’ नहीं है। ट्रंप प्रशासन की तमाम आक्रामक धमकियों और प्रतिबंधों के बाद भी भारत की अर्थव्यवस्था और रणनीतिक हितों पर आंच तक नहीं आई। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि भारत अब महाशक्तियों के दबाव में आए बिना अपने फैसले खुद लेता है।



