बस्तर का वो अमर भूमकाल आंदोलन: जब आम की टहनियों और लाल मिर्च के संदेश से थर-थर कांप उठे थे अंग्रेज! पढ़िए वीर गुंडाधूर का शौर्य!

(Fourth Eye News): जब-जब भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिखा जाएगा, तब-तब छत्तीसगढ़ के बस्तर की पावन भूमि पर लड़े गए ‘भूमकाल विद्रोह’ (1910) को स्वर्ण अक्षरों में अंकित किया जाएगा। यह आंदोलन केवल अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह अपनी माटी, अपनी संस्कृति, जल-जंगल-जमीन और आत्मसम्मान की रक्षा का महासंग्राम था। इस महान जन-आंदोलन के नायक थे नेतानार के महान आदिवासी योद्धा वीर गुंडाधूर।
‘डारा-मिर्च’ का गुप्त संदेश और अंग्रेजों की नींद हराम
1910 में अंग्रेजों की दमनकारी और शोषणकारी नीतियों के खिलाफ बस्तर के आदिवासियों का गुस्सा फूट पड़ा। वीर गुंडाधूर ने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की ज्वाला जगाने के लिए एक अनूठा तरीका अपनाया। एक गांव से दूसरे गांव तक ‘आम की सूखी टहनियां (डारा), लाल मिर्च, तीर और धनुष’ गुप्त संदेश के रूप में भेजे जाते थे। इसका अर्थ होता था— “मातृभूमि की रक्षा के लिए तैयार हो जाओ!”
जिसे अंग्रेज कभी जिंदा या मुर्दा नहीं पकड़ सके
गुंडाधूर के नेतृत्व में आदिवासियों ने अंग्रेजों के थानों और रसद आपूर्ति को पूरी तरह ठप कर दिया। अंग्रेजों ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए अपनी पूरी सैन्य ताकत झोंक दी और गुंडाधूर पर भारी इनाम रखा। लेकिन बस्तर के जंगलों का यह बेटा अंग्रेजों के हाथ कभी नहीं आया। वे ताउम्र आजाद रहे और ब्रिटिश हुकूमत के लिए एक अबूझ पहेली बने रहे। वीर गुंडाधूर की यह गाथा आज भी बस्तर के जन-जन में देशभक्ति का संचार करती है।




