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क्या नाटो की तर्ज पर बन रहा है इस्लामिक सैन्य ब्लॉक? भारत और वेस्ट के लिए बड़ा झटका!

क्या मिडल ईस्ट और दक्षिण एशिया का नक्शा हमेशा-हमेशा के लिए बदलने जा रहा है? अमेरिका के घटते दबदबे और ईरान के साथ जारी भीषण युद्ध के बीच रियाद में एक ऐसा सैन्य गठबंधन आकार ले चुका है जिसने वाशिंगटन से लेकर नई दिल्ली तक की नींद उड़ा दी है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मिलकर ‘मक्का पैक्ट’ (Mecca Pact) की घोषणा की है, जो इस क्षेत्र में एक नए सुरक्षा ढांचे की शुरुआत मानी जा रही है।

गठबंधन की मुख्य विशेषताएं:

त्रिपक्षीय सुरक्षा गारंटी: तीनों देशों के बीच रक्षा, खुफिया जानकारी साझा करने और संयुक्त सैन्य अभियानों का एक ऐतिहासिक समझौता हुआ है।

तकनीक और मैनपावर का मेल: तुर्की की उन्नत ड्रोन और मिसाइल तकनीक, पाकिस्तान की परमाणु-सक्षम विशाल सेना और सऊदी अरब के असीमित वित्तीय संसाधन अब एक मंच पर आ चुके हैं।

ईरान पर नजर: हालांकि ईरान ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि इस समझौते से डरने की जरूरत नहीं है, लेकिन पर्दे के पीछे इसे तेहरान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के रूप में देखा जा रहा है।

ऐतिहासिक संदर्भ:

दशकों तक खाड़ी देशों की सुरक्षा का ठेका अमेरिका के पास था। लेकिन हालिया वर्षों में वाशिंगटन की हिचकिचाहट और इजरायल-ईरान युद्ध में अमेरिका के उलझने से सऊदी अरब ने महसूस किया कि उसे एक वैकल्पिक ‘स्थानीय’ सुरक्षा छतरी की जरूरत है। तुर्की के नाटो मानक और पाकिस्तान का परमाणु ट्रैक रिकॉर्ड रियाद को वह सुरक्षा प्रदान करते हैं जिसकी उसे तलाश थी।

पक्ष-विपक्ष के दावे:

गठबंधन के साझेदारों का कहना है कि यह समझौता पूरी तरह से ‘क्षेत्रीय स्थिरता और रक्षात्मक प्राथमिकताओं’ के लिए है। हालांकि, पश्चिमी विश्लेषक इसे “गैर-नाटो देशों का नया शक्तिशाली सैन्य धड़ा” करार दे रहे हैं, जो जरूरत पड़ने पर अमेरिका की नीतियों को दरकिनार करने की क्षमता रखता है।

भारत पर असर:

भारत के लिए यह घटनाक्रम बेहद संवेदनशील है। पाकिस्तान का सऊदी अरब और तुर्की जैसे समृद्ध व सैन्य रूप से शक्तिशाली देशों के साथ इतना गहरा औपचारिक रक्षा समझौता भारत के लिए कूटनीतिक चुनौती खड़ी कर सकता है। हालांकि, भारत के सऊदी अरब के साथ मजबूत आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं, लेकिन पाकिस्तान को मिलने वाला कोई भी सैन्य लाभ नई दिल्ली के लिए चिंता का विषय है।

सबसे बड़ा सवाल:

क्या ‘मक्का पैक्ट’ मुस्लिम जगत का एक स्थायी और नया शक्ति-केंद्र बन पाएगा, या फिर तीनों देशों के अपने-अपने विरोधाभासी राष्ट्रीय हित जल्द ही इस गठबंधन में दरार डाल देंगे?

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