पश्चिम एशिया के जलजले के बीच भारत का महा-रणनीतिक दांव: अमेरिका और इजराइल ने मानी नई दिल्ली की बात, हिंद महासागर में भारत का ‘लौह कवच’!

पश्चिम एशिया में भड़के भीषण युद्ध और अमेरिका-ईरान-इजराइल त्रिकोण के बीच मची भारी तबाही के दौरान भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और कूटनीतिक आक्रामकता का लोहा पूरी दुनिया में मनवाया है। बीते 24 घंटों में हुए नाटकीय घटनाक्रम में वाशिंगटन और तेल अवीव दोनों ने स्वीकार किया है कि हिंद महासागर और अरब सागर में भारत की समुद्री उपस्थिति ही वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बिखरने से बचाने वाला एकमात्र ‘लौह कवच’ है। दुनिया की दो बड़ी महाशक्तियों ने भारत के राष्ट्रीय हितों और उसकी स्वतंत्र विदेश नीति के आगे सिर झुकाते हुए समुद्री सुरक्षा का नेतृत्व नई दिल्ली को सौंपने की भारत की मांग पर सहमति जताई है।
मध्य पूर्व में भड़के संकट के बाद जहां अमेरिका और इजराइल दोनों ईरान के खिलाफ कड़े रुख पर अड़े थे, वहीं भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया कि भारत किसी भी सैन्य गुट का मोहरा नहीं बनेगा। नई दिल्ली ने साफ शब्दों में अमेरिका और इजराइल को कड़ा संदेश दिया कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और 90 लाख से अधिक प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। भारत के इस सख्त रुख के सामने झुकते हुए अमेरिकी प्रशासन ने अरब सागर में भारतीय नौसेना के विशेष ‘समुद्री सुरक्षा कॉरिडोर’ को पूर्ण समर्थन देने का ऐलान किया है।
इजराइल, जो इस समय क्षेत्रीय युद्ध में उलझा हुआ है, उसने भी भारत की संतुलित लेकिन आक्रामक रणनीति का सम्मान किया है। भारतीय कूटनीति का ही असर है कि इजराइल ने भारतीय स्वामित्व वाले या भारतीय क्रू वाले जहाजों को युद्ध क्षेत्र से सुरक्षित निकालने के लिए भारत के साथ सीधा हॉटलाइन संपर्क स्थापित किया है। इसके साथ ही, भारत ने इजराइल और अमेरिका दोनों को स्पष्ट कर दिया है कि हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में किसी भी तीसरे देश की अवांछित नौसैनिक हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। भारतीय नौसेना ने उत्तरी अरब सागर से लेकर अदन की खाड़ी तक अपने अग्रिम पंक्ति के विध्वंसकों (Guided Missile Destroyers) और P-8I समुद्री गश्ती विमानों की तैनाती को दोगुना कर दिया है।
भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर द्वारा अपनाई गई आक्रामक रणनीतिक स्वायत्तता की नीति ने अमेरिका के उन प्रयासों को भी धता बता दिया है, जिनके तहत भारत पर एकतरफा पश्चिमी प्रतिबंधों का पालन करने का दबाव बनाया जा रहा था। भारत ने साफ कर दिया है कि वह अपने राष्ट्रीय हित में जहां से भी सही समझेगा, ऊर्जा संसाधन खरीदना जारी रखेगा। नई दिल्ली की इस दबंग कूटनीति के कारण न केवल भारत की कच्चे तेल की आपूर्ति पूरी तरह सुरक्षित है, बल्कि भारत ने वैश्विक शांति वार्ता में मुख्य मध्यस्थ का दर्जा भी हासिल कर लिया है।
दुनिया भर के रणनीतिक विश्लेषक भारत के इस महा-रणनीतिक दांव की तारीफ कर रहे हैं। जहां एक तरफ पश्चिमी महाशक्तियां और मध्य पूर्व के देश युद्ध की आग में झुलस रहे हैं, वहीं भारत ने अपनी नौसैनिक और कूटनीतिक ताकत के बल पर पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में अपना एकतरफा वर्चस्व स्थापित कर लिया है। अमेरिका और इजराइल द्वारा भारत की शर्तों को स्वीकार करना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि आज का नया भारत किसी के दबाव में काम नहीं करता, बल्कि वैश्विक व्यवस्था की शर्तें खुद तय करता है।




