प्रेमचंद जयंती पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय की नई पहल, ‘बौद्धिक विमर्श इकाई’ का गठन, भाषा की शुचिता पर राष्ट्रीय चर्चा

रायपुर स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर एक नई बौद्धिक पहल की शुरुआत की गई। विश्वविद्यालय ने ‘बौद्धिक विमर्श इकाई’ की स्थापना करते हुए “सार्वजनिक जीवन में भाषा की शुचिता” विषय पर राष्ट्रीय स्तर का विशेष विमर्श आयोजित किया। इस पहल का उद्देश्य समकालीन विषयों पर सार्थक संवाद और वैचारिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना है।
कार्यक्रम में कुलपति प्रो. डॉ. मनोज दयाल ने प्रेमचंद के साहित्य और पत्रकारिता में दिए गए योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से समाज की विसंगतियों को उजागर किया और आमजन की सहज भाषा को साहित्य की मुख्यधारा में स्थापित किया। उन्होंने कहा कि आज भाषा की शुचिता केवल व्याकरण तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उसमें सत्य, संतुलन, संवेदनशीलता और वस्तुनिष्ठता का समावेश भी आवश्यक है। सकारात्मक संवाद समाज को जोड़ता है, जबकि अमर्यादित भाषा सामाजिक दूरी बढ़ाने का कारण बनती है।
कुलसचिव सुनील शर्मा ने कहा कि प्रभावी संवाद वही होता है जो श्रोता की गरिमा और समझ का सम्मान करे। सार्वजनिक जीवन में व्यक्ति की भाषा ही उसके व्यक्तित्व और विचारों का परिचायक होती है।
कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठ शिक्षकों ने भी डिजिटल युग में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच भाषा की मर्यादा, संयम और जिम्मेदारी बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका कहना था कि पत्रकारिता और समाज, दोनों के लिए संवाद की शालीनता आज सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने बताया कि नवगठित ‘बौद्धिक विमर्श इकाई’ के माध्यम से अब नियमित रूप से समकालीन और जनसरोकार से जुड़े विषयों पर परिचर्चाएं आयोजित की जाएंगी, जिससे विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच स्वस्थ बौद्धिक वातावरण विकसित हो सके। कार्यक्रम में डॉ. शैलेंद्र खंडेलवाल, डॉ. आशुतोष मंडावी, डॉ. नृपेंद्र शर्मा, डॉ. राजेंद्र मोहंती और पत्रकारिता विभागाध्यक्ष पंकज नयन पांडेय सहित विश्वविद्यालय परिवार के सदस्य उपस्थित रहे।




