अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। बुधवार, 21 अक्टूबर को प्रकाशित रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी दर्ज की गई। रिपोर्ट के अनुसार, ब्रेंट क्रूड वायदा करीब 1.5 प्रतिशत बढ़कर 110.38 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी WTI क्रूड करीब 99.18 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।
तेल की कीमतों में इस तेजी के पीछे क्षेत्रीय तनाव के अलावा अमेरिका में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के भंडार में गिरावट भी एक वजह रही। रिपोर्ट में अमेरिकी पेट्रोलियम भंडार से जुड़े आंकड़ों का उल्लेख किया गया है। समुद्री जहाजों की सुरक्षा और तेल की ढुलाई को लेकर बढ़ती चिंताएं भी बाजार पर असर डाल रही हैं।
भारत के लिए क्यों अहम है यह खबर?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से देश के आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में हर उछाल का असर घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर तुरंत या उसी अनुपात में पड़े, यह जरूरी नहीं है। रुपये की विनिमय दर, सरकारी कर, तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति और अन्य लागतें भी इसमें भूमिका निभाती हैं।
तेल महंगा रहने पर परिवहन, माल ढुलाई और उत्पादन की लागत बढ़ने का जोखिम रहता है। इसका असर आगे चलकर खाद्य वस्तुओं और दूसरी उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या क्षेत्रीय तनाव लंबा खिंचेगा और तेल की आपूर्ति वास्तव में कितनी प्रभावित होगी। बाजार की दिशा इसी पर काफी हद तक निर्भर करेगी।



