अमेरिका-ईरान की जंग में तेल की आग भड़की, भारत समेत दुनिया पर मंडराया महंगाई का खतरा

अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव का असर अब युद्ध क्षेत्र से बाहर निकलकर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। 17 अगस्त की ताजा रिपोर्टों में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट सामने आई है। इस घटनाक्रम ने भारत समेत तेल आयात पर निर्भर देशों के लिए चिंता बढ़ा दी है।
रॉयटर्स के अनुसार सोमवार को ब्रेंट क्रूड 89.40 डॉलर प्रति बैरल तक चढ़ गया, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई 82.83 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। दोनों बेंचमार्क पिछले सप्ताह भी 5 प्रतिशत से अधिक की बढ़त दर्ज कर चुके थे। बाजार में तेजी का बड़ा कारण अमेरिका-ईरान शांति वार्ता में ठहराव और होर्मुज से कम होती टैंकर आवाजाही है।
होर्मुज की स्थिति बेहद गंभीर है। शनिवार को इस जलमार्ग से केवल पांच कमोडिटी जहाज गुजरे और रविवार को एक भी जहाज नहीं निकला। इससे पहले वाले सप्ताहांत में 31 जहाजों ने रास्ता पार किया था। फरवरी में युद्ध शुरू होने से पहले रोजाना 130 से अधिक जहाज इस मार्ग से गुजरते थे।
भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज उछाल का असर आयात बिल और घरेलू ईंधन बाजार पर पड़ सकता है। ऐसे समय में भारत की सबसे बड़ी चुनौती होगी कि पश्चिम एशिया के तनाव के बीच ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर रखा जाए।
लेकिन भारत की स्थिति केवल चुनौती वाली नहीं है। नई दिल्ली पिछले कई महीनों से पश्चिम एशिया के अलग-अलग पक्षों के साथ संपर्क बनाए हुए है। ईरान के राष्ट्रपति की ओर से प्रधानमंत्री मोदी को स्वतंत्रता दिवस की बधाई और भारत-ईरान सहयोग बढ़ाने की इच्छा का संदेश भी इसी व्यापक कूटनीतिक सक्रियता के बीच आया है।
युद्ध की आग में तेल सबसे बड़ा हथियार बनता जा रहा है। अमेरिका ईरान पर दबाव बढ़ा रहा है, ईरान होर्मुज को लेकर अपनी स्थिति से पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा और बाजार हर नए घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया दे रहा है। ऐसे समय में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और बहुपक्षीय कूटनीति उसके लिए सबसे बड़ा कवच साबित हो सकती है।



