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दर्शकों की डिमांड पर : लोरमी विधानसभा का विश्लेषण,एक ऐसी सीट जो कभी किसी एक राजनितिक दल की प्रतिष्ठा नहीं रही

लोरमी विधानसभा का विश्लेषण

नमस्कार दोस्तों, फोर्थ आई न्यूज़ में एक बार फिर आप सभी का स्वागत है। दोस्तों पिछले कई दिनों से हम आपके लिए हमारे छत्तीसगढ़ की अलग-अलग विधानसभा सीटों का विश्लेषण लेकर आ रहे हैं। दर्शकों ने हमसे अपील की थी कि एक बार लोरमी विधानसभा सीट का भी विश्लेषण किया जाए तो दर्शकों की इस मांग का सम्मान करते हुए हम हाज़िर हैं लोरमी विधानसभा सीट से जुडी हर अहम् जानकारी लेकर।

लोरमी विधानसभा सीट हमारे छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले की एक सीट है. ये मुंगेली लोकसभा सीट का हिस्सा है, जो केंद्रीय इलाके में पड़ता है. लोरमी सामान्य सीट है। मुंगेली जिले की लोरमी विधानसभा सीट कभी किसी एक राजनीतिक दल की प्रतिष्ठा नहीं रही है. कांग्रेस ने इस सीट पर सबसे ज्यादा बार जीत का परचम लहराया है. 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले इस लोरमी सीट पर बीजेपी का कब्जा था, लेकिन फिर मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच नहीं रहकर जेसिसीजे की एंट्री से त्रिकोणीय हो गया।

लोरमी की भौगोलिक परिशतियों की बात करें तो तलहटी में बसा लोरमी कुदरती तौर पर काफी समृद्ध है. अचानकमार टाइगर रिजर्व और खुड़िया जलाशय इस इलाके की पहचान हैं. अंग्रेजों के जमाने से ही ये इलाका चर्चा में रहा है. इसके सियासी इतिहास की बात की जाए तो शुरूआत से ही यहां की राजनीति पर राज परिवारों और जमींदारों का कब्जा रहा है.

यहां के जातिगत समीकरण की बात करें तो यहां 30 फीसदी अनुसूचित जाति और 20 फीसदी अनुसूचित जनजाति मतदाता हैं. जबकि 35 फीसदी पिछड़ा वर्ग जिसमें साहू समुदाय के लोग सबसे ज्यादा हैं. इसके अलावा 15 फीसदी में ब्राह्मण, ठाकुर और दूसरे सामान्य मतदाता भी आते हैं. लोरमी विधानसभा सीट पर अब तक हुए 15 चुनाव हुए हैं जिसमें 7 बार कांग्रेस, 3 बार रामराज्य परिषद और 4 बार बीजेपी ने जीत हासिल की है. वहीं अपने पहले ही चुनाव में जोगी जनता कांग्रेस अपना खाता खोलने में कामयाब रही। पिछले चुनाव के पहले यहां से बीजेपी के तोखन साहू विधायक थे।

इस सीट पर यूँ तो कांग्रेस का प्रभाव माना जाता था। मगर पिछली बार लोरमी विधानसभा में धरमजीत सिंह के जोगी के साथ जाने के बाद यहां का सियासी समीकरण बदल गया।

इसके पहले के चुनावों की बात करें तो साल 2003 के लोरमी विधानसभा चुनाव में जब धरमजीत सिंह कांग्रेस में थे तब उन्होंने इस सीट से चुनाव लड़ते हुए 47 हज़ार 998 वोटों के साथ जीत हासिल की थी। उन्होनें बीजेपी के मुनीराम साहू को हराया था जिन्हें 32 हज़ार 332 वोट मिले थे। फिर आया साल 2008 का विधानसभा चुनाव इस चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस ने धर्मजीत सिंह को दोबारा मौका दिया और धरमजीत सिंह ने इस मौके को भरपूर भुनाया भी। उस चुनाव में इनके खिलाफ बीजेपी ने अपना प्रत्याशी बदलते हुए जवाहर लाल साहू को मैदान में उतारा। धरमजीत सिंह को जहाँ 48 हज़ार 569 वोट मिले तो वहीं
बीजेपी के जवाहर साहू को 43580 वोट मिले थे।

मगर साल 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को लगातार तीसरी बार अपने सिटिंग एमएलए पर भरोसा करना भारी पड़ गया। कांग्रेस से जहाँ एक बार फिर धर्मजीत सिंह चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे थे तो वहीं बीजेपी ने तोखन साहू को अपना उम्मीदवार बनाया था। और इस चुनाव में धरमजीत सिंह को हार का सामना करना पड़ा। उन्हें कुल 46 हज़ार 061 वोट मिले थे वहीं बीजेपी के तोख साहू 52 हज़ार 302 कुल वोटों से जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे।

मगर साल 2018 के विधानसभा चुनाव के आते तक सियासी समीकरण काफी बदल गए। कभी कांग्रेस से लगातार विधायक चुने जाते रहे धर्मजीत सिंह ठाकुर अजित जोगी के साथ कांग्रेस छोड़कर जे.सी.सी जे में आ आ गए और उसी की टिकट पर चुनाव लड़ा। बीजेपी ने अपने सिटिंग एमएलए तोखन राम साहू पर दोबारा ऐतबार किया वहीं कांग्रेस अपने गढ़ माने जाने वाले लोरमी के लिए लालायित थी। धर्मजीत सिंह अब पार्टी में रहे नहीं थे लिहाज़ा उसे अपना कैंडिडेट बदलते हुए शत्रुघ्न लाल चंद्राकर को टिकट देना बड़ा। इस चुनाव में जेसिसीजे के धर्मजीत सिंह को कुल 67 हज़ार 742 वोट मिले थे। वहीं बीजेपी के तोखन राम साहू को 42 हज़ार 189 वोट तो कांग्रेस के शत्रुघ्न लाल चंद्राकर के पाले में टोटल 16 हज़ार 669 वोट ही आए। और इस तरह धरमजीत सिंह अपनी विधायकी पर दोबारा काबिज़ हो गए।

इस बार साल 2023 के विधानसभा चुनाव में तो समीकरण और बदल रहे हैं क्योंकि धरमजीत सिंह को जेसिसीजे ने पार्टी से निष्कासित कर दिया है अगर आप इसके पीछे की वजह जानना चाहते हैं तो हमने पहले से ही उसपर एक स्पेशल स्टोरी बनाई हुई है जिसे आप ऊपर आई बटन क्लिक करके देख सकते हैं। वहीं इस बार लोरमी में कौन-कौन से प्रत्याशी विभिन्न पार्टियों से चुनावी मैदान में उत्तर सकते हैं और धर्मजीत सिंह जो फिलहाल किसी पार्टी में नहीं हैं क्या चुनाव से पहले किसी पार्टी का दामन थामकर मैदान में उत्तर सकते हैं

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