बस्तर के वो 5 ‘रणबांकुरे’, जिन्होंने माओवादियों की नींद उड़ा दी है!

रायपुर। 31 मार्च 2026… केंद्र सरकार ने भारत से नक्सलवाद को पूरी तरह खत्म करने के लिए यही डेडलाइन तय की है। और इस महा-अभियान का ग्राउंड ज़ीरो है हमारा बस्तर। लाल आतंक के इस अभेद्य किले को ढहाने के लिए इस वक्त मोर्चे पर तैनात हैं कुछ ऐसे जांबाज अफसर, जिन्होंने नक्सलियों के टॉप कमांडरों को या तो सरेंडर करने पर मजबूर कर दिया है, या फिर उन्हें ‘ऑपरेशन कगार’ के तहत मिट्टी में मिला दिया है। आज हम आपको बस्तर के उन 5 ‘सुपर कॉप्स’ से मिलवाएंगे, जो अपनी अलग-अलग रणनीतियों, अचूक खुफिया नेटवर्क और ग्राउंड ऑपरेशन्स के जरिए 2026 के इस सबसे बड़े मिशन को लीड कर रहे हैं।
आईजी पी. सुंदरराज (बस्तर रेंज) – ‘द कमांडर’
नक्सल विरोधी अभियानों का सबसे बड़ा चेहरा हैं बस्तर रेंज के आईजी पी. सुंदरराज। 2003 बैच के इस आईपीएस अधिकारी के पास बस्तर का सबसे लंबा और जमीनी अनुभव है। 2025 और 2026 की शुरुआत में हुए सभी बड़े ऑपरेशन्स इन्ही की कमान में लड़े गए हैं। ‘पुना मड़कम’ (नई सुबह) अभियान के जरिए इन्होंने जहां हजारों नक्सलियों को मुख्यधारा से जोड़ा, वहीं हथियार उठाने वालों को कड़ा जवाब दिया। हाल ही में मार्च 2026 में 108 नक्सलियों के सरेंडर और करोड़ों की रिकवरी के पीछे आईजी सुंदरराज का ही अचूक खुफिया नेटवर्क था।
ए़डीजी विवेकानंद सिन्हा (नक्सल ऑपरेशन, छत्तीसगढ़) – ‘द स्ट्रेटेजिस्ट’
बस्तर के बीहड़ों में चल रही गोलियों के पीछे की जो सबसे बड़ी रणनीति है, वो एडीजी (नक्सल ऑपरेशन) विवेकानंद सिन्हा के दफ्तर से होकर गुजरती है। राज्य पुलिस, DRG, STF और केंद्रीय बल (CRPF) के बीच सटीक तालमेल बैठाने की जिम्मेदारी इन्हीं के कंधों पर है। मई 2025 में बीजापुर के कर्रेगुट्टा पहाड़ियों पर हुए उस ऐतिहासिक एनकाउंटर को कौन भूल सकता है, जिसमें 19 खूंखार नक्सली मारे गए थे? इस पूरे ऑपरेशन की मॉनिटरिंग खुद एडीजी सिन्हा कर रहे थे।
एसपी किरण जी. चव्हाण (सुकमा) – ‘मिशन 2026 के नायक’
सुकमा… नक्सलियों की ‘राजधानी’ कहे जाने वाले इस जिले में 2018 बैच के युवा आईपीएस किरण जी. चव्हाण ने माओवादियों की कमर तोड़ दी है। पुणे से मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने वाले और एक किसान परिवार से आने वाले किरण का विजन बिल्कुल साफ है- 2026 तक सुकमा को पूरी तरह नक्सल मुक्त करना। इसके लिए वो ‘थ्री-स्टेप स्ट्रेटेजी’ पर काम कर रहे हैं- सुरक्षा, विकास और कम्युनिटी एंगेजमेंट। पिछले कुछ महीनों में सुकमा के उन कोर इलाकों में सुरक्षा कैंप स्थापित कर दिए गए हैं, जहां कभी पुलिस पहुंच भी नहीं पाती थी।
एसपी डॉ. जितेंद्र कुमार यादव (बीजापुर) – ‘ग्राउंड जीरो के एक्शन मैन’
पिछले एक-डेढ़ साल में बीजापुर नक्सल ऑपरेशन्स का सबसे बड़ा ‘बैटलग्राउंड’ रहा है। यहां मोर्चे पर डटे हैं आईपीएस डॉ. जितेंद्र कुमार यादव। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बॉर्डर से लगे इस जिले में नक्सलियों को घेरने के लिए डॉ. यादव ने जवानों को फ्रंटलाइन से लीड किया है। चाहे कर्रेगुट्टा का ऑपरेशन हो या हाल ही में माओवादियों की सप्लाई चेन काटना, बीजापुर पुलिस ने इनके नेतृत्व में बड़े-बड़े इनामी कमांडरों को ढेर कर ‘ऑपरेशन कगार’ को सबसे ज्यादा सफल बनाया है।
एसपी गौरव राय (दंतेवाड़ा) – ‘द साइलेंट किलर ऑफ नक्सल नेटवर्क’
दंतेवाड़ा के एसपी गौरव राय ने एक अलग ही मोर्चे पर नक्सलियों को मात दी है। एनकाउंटर्स के साथ-साथ दंतेवाड़ा पुलिस का फोकस माओवादियों के ‘भर्ती नेटवर्क’ और ‘फाइनेंस’ को पूरी तरह ध्वस्त करने पर है। दंतेवाड़ा के ऐतिहासिक ‘लोन वर्राटू’ (घर वापस आइए) अभियान को 2025-2026 में एक नई ऊंचाई मिली है। एसपी गौरव राय की रणनीति के कारण कई हार्डकोर महिला और पुरुष कैडर ने हिंसा का रास्ता छोड़कर हल और ट्रैक्टर थाम लिया है।
गोलियों की गूंज के बीच इन 5 अफसरों और इनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले हजारों जवानों ने बस्तर की तस्वीर बदल दी है। जिस तेजी से जंगलों में सुरक्षाबलों के बूटों की थाप बढ़ रही है, उसे देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि 31 मार्च 2026 तक भारत को नक्सल मुक्त करने का सपना अब बस हकीकत बनने ही वाला है।




