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सीनेट के 86 ‘दुश्मनों’ को भारत का करारा जवाब! ‘लिंडसे ग्राहम एक्ट’ की धमकी से नहीं डरेगा नया हिंदुस्तान, अपनी शर्तों पर ही खरीदेगा रूसी तेल!

वाशिंगटन/नई दिल्ली:
अमेरिकी सीनेट ने अपनी पुरानी साम्राज्यवादी हेकड़ी का प्रदर्शन करते हुए ‘लिंडसे ग्राहम सेंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026’ को 86-11 के भारी बहुमत से पारित कर दिया है [Al Jazeera: US Senate passes sweeping Russian energy sanctions bill]. यह बिल सीधे तौर पर भारत जैसे संप्रभु और स्वाभिमानी राष्ट्रों की आर्थिक आजादी पर एक सोची-समझी चोट है। इस दमनकारी कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि वे रूस और ईरान से पेट्रोलियम उत्पाद या ऊर्जा की खरीद करने वाले किसी भी देश पर 100% तक का प्रतिशोधात्मक टैरिफ (Tariff) लगा सकते हैं।

वाशिंगटन के नीति-निर्माता शायद इस मुगालते में हैं कि वे प्रतिबंधों का डर दिखाकर भारत जैसी वैश्विक महाशक्ति को अपनी उंगलियों पर नचा लेंगे। लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि यह 2026 का नया और आत्मनिर्भर भारत है, जो अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा आवश्यकताओं के फैसले वाशिंगटन या किसी अन्य विदेशी संसद के बंद कमरों में नहीं, बल्कि नई दिल्ली के संसद भवन से तय करता है।

विदेशी कागज के टुकड़े के मोहताज नहीं हैं भारत

भारतीय विदेश मंत्रालय और रणनीतिक विशेषज्ञों ने इस अमेरिकी कदम पर बेहद तीखा और बेबाक रुख अख्तियार किया है। नई दिल्ली ने साफ संदेश दे दिया है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और उसके 1.4 अरब नागरिकों के हित किसी भी विदेशी कागज के टुकड़े के मोहताज नहीं हैं। भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा रूस से रियायती दरों पर खरीद रहा है और इसे बंद करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। भू-राजनीतिक हकीकत यह है कि अमेरिका इस कानून को भारत पर पूरी तरह लागू करने की हिम्मत नहीं कर पाएगा।

वाशिंगटन को हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में चीन के बढ़ते राक्षसी प्रभाव को रोकने के लिए भारत की सैन्य और रणनीतिक शक्ति की सबसे ज्यादा जरूरत है। यदि अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध लगाने की हिमाकत की, तो ‘क्वाड’ (QUAD) जैसा महत्वपूर्ण रणनीतिक गुट ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगा, जिससे अमेरिका खुद वैश्विक मंच पर अलग-थलग पड़ जाएगा। संभावनाएं साफ हैं: भारत इस दबाव के आगे रत्ती भर भी नहीं झुकेगा, बल्कि वह ब्रिक्स (BRICS) और अन्य वैकल्पिक आर्थिक मंचों के जरिए अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को और तेज करेगा। अमेरिका का यह ‘प्रेशर टैक्टिक’ भारत के अडिग संकल्प के सामने पूरी तरह फेल होने वाला है।


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