MPCG की मीडिया में फेमस होता एक नाम ‘दीमक लाल’

दीमक लाल जी हां ये एक ऐसा नाम है जो, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की इलेक्ट्रोनिक मीडिया में इनदिनों लगातार प्रचलन में आता जा रहा है, लोग खुले तौर पर नहीं तो पीठ पीछे, इस शख्स का संबोधन कुछ इसी नाम से करने लगे हैं, हालांकि एमपीसीजी के इलेक्ट्रोनिक मीडिया के ज्यादातर लोग इस नाम से परिचित हैं और जो नहीं हैं, हमारा ये आर्टिकल पूरा पढ़ लें, शायद समझ जाएंगें.

कौन है ये दीमक लाल ?

दरअसल ये दीमक लाल एमपीसीजी के एक चैनल का बड़ा अधिकारी है, जो कभी टिकर पर बैठा करता था, हालांकि आज भी वो टिकर पर ही बैठने लायक है, लेकिन वो कहते हैं न ‘किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान’ कुछ ऐसा ही दीमक लाल के साथ है, आज वो पत्रकारिता में उससे कहीं ज्यादा अनुभव रखने वाले और उससे कहीं ज्यादा टेलेंटेड, पत्रकारों का बॉस कहलता है, कुर्सी का रुतबा ऐसा कि बिना अपनी गिरेबां में झांके उन्हें आंख भी दिखाता है, हर वक्त सिर्फ टिकर पर ध्यान रखता है, लाइव बुलेटिन बनाने से कतराता है, अपने कैबिन की जगह ज्यादातर वक्त रिसेप्शन पर पाया जाता है.

सहकर्मियों का पाजामा कैसे करता है टाइट ?

दीमक लाल की पर्सनालिटी ऐसी है कि नए सहकर्मियों को वो पहली नजर में वो लल्लू और खुशमिजाज नजर आता है, लेकिन वक्त के साथ-साथ इस सहकर्मी का पाजामा टाइट होता जाता है, इस सहकर्मी के पाजामे के नाड़े की पहली गांठ, दीमक लाल छुट्टी मांगने पर बांधता है और दूसरी गांठ शिफ्ट को लेकर टाइट करता है, और इन दो गांठों से दीमक उसका पाजामा इतना टाइट कर देता है, कि उस सहकर्मी की ऊपर से जुबान तो नीचे से पोट्टी निकलने को बेताब हो जाती है, क्योंकि कंपनी ज्वाइन करते वक्त बेचारा नया कर्मचारी भोलेपन में अपनी सारी पसंद न पसंद दीमक लाल के सामने उगल कर बैठ जाता है, उसकी यही उगली हुई उलटी आगे जागकर उसी पर भारी पड़ जाती है, क्योंकि उसे जरा भी अहसास नहीं होता, कि तीन उंगलियों से माउस पकड़े और चश्मा नाक पर लटकाकर ऊपर से निहार रहा वो शख्स, जो उसे फिलहाल खुशमिजाज लगता है, वो आगे जाकर, उसकी पसंद की चीजों को बंद करने वाला है और जो नापसंद है उसे ही पसंद करने वाला.

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दीमक लाल के टारगेट फिक्स कैसे होते हैं ?

अब बात आती है टारगेट फिक्स करने की, सबसे पहले तो दीमक को ये पसंद नहीं कि कोई उससे छुट्टी मांगे,  और अगर मांगे भी तो कुछ ऐसे गिड़गिड़ाये जैसे कि वो मालिक और छुट्टी मांगने वाला डॉगी है, यानि की पूंछ हिलाते हुए, जिसने हिलाई तो ठीक, नहीं तो एक टारगेट फिक्स, अगर ये रिपिटेशन एक-दो-बार हुआ,  तो समझ लो वक्त के साथ-साथ छुट्टी मांगने वाले की फिल्डिंग जमने लगी है और छुट्टी जाते ही उसकी  डायरी बॉस के कैबिन में पहुंचने लगी है, हालांकि दीमक लाल अपने करीब-करीब सभी टारगेटों पर सफलता पूर्वक विजय हासिल करता आया है, और फिलहाल अकेला ही कबड्डी खेल रहा है, अब या तो उसके कट्टर चमचे मैदान में हैं, या फिर वो लोग जिनसे उसे किसी भी तरह का कोई खतरा नहीं है, लेकिन फिर भी कुछ पुराने लोगों पर उसकी नजर है, जिनकी सैलरी उसकी नजर में ज्यादा है ।

दीमक लाल की खूबियां ?

यूं तो दीमक लाल में ढेरों खूबियां हैं, लेकिन सबसे बड़ी खूबी चापलूसी है, अपने बॉस को कैसे खुश रखना है, दीमक लाल बखूबी जानता है, यही वजह है कि उसके कई बॉस आए और गए, लेकिन दीमक लाल टस से मस नहीं हुआ और दीमक ने जैसे चाहा, हर बॉस को वैसे ही अपने सांचे में फिट कर लिया, यही वजह है कि, बड़े कैबिन में बड़ी कुर्सी पर बैठा दीमक का बॉस वही देखता है, जो दीमक लाल अपने चश्मे से उसे दिखाता है, मसलन, स्क्रीन पर कौन मोटा दिख रहा है ?, किसका लुक खराब आ रहा है ?,  किसका  प्रजेंटेशन सही नहीं है, किसकी ज्यादा छुट्टी हैं, किसका काम सही नहीं है, हालांकि ज्यादातर मामलों में उसकी अपनी ही बिछाई सेटिंग होती है, जैसे कि अपने टारगेट को अपने चमचों के जरिये इतना उकसा दिया जाता है कि टारगेट तेश में आ जाये, बस ये तैश बन गया दीमक का हथियार, और अब उसके बॉस के चश्मे का कलर भी वही होता है, जो दीमक लाल उसे पहना देता है ।

मतलब किस कर्मचारी की बॉस की नजर में क्या इमेज बनानी है, किसी को सीखना है, तो दीमक लाल से अच्छा शायद ही कोई दूसरा सिखा सके, यही वजह है, करीब दस साल पहले 30,000/- रुपए महीने से कंपनी में शुरू हुआ, उसका बैंक अकाउंट, आज 1 लाख रुपए से ज्यादा आते ही मदमस्त हो उठता है.

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कैसे एक अधिकारी बना दीमक लाल‘ ?

दरअसल दीमक लाल के इस नाम की शुरूआत यही कोई एक साल पहले हुई, जब उसके सताए और गले तक भरे बैठे एक सहकर्मी ने उसे इस आकर्षक नाम से नावाजा, इसके बाद दूसरे लोगों ने भी उसकी पर्सनालिटी को देखते हुए इस नाम को हाथों-हाथ ले लिया, और अब ये नाम प्रचलन में है, साथीगण पीठ पीछे उसे इसी नाम से बुलाते हैं, यही नहीं उसके खासमखास चमचे भी उसकी पीठ के पीछे इसी आकर्षक नाम का इस्तेमाल करते हैं.

क्यों फिट बैठता है ये नाम ?

इस बात में कोई दो राय नहीं कि देश में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है, कई नए चैनल भी आते हैं, लेकिन वे भी मीडियाकर्मियों के करियर से खिलवाड़ करके चले जाते हैं, ऐसे में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी न जाने कितने मीडियाकर्मी भी या तो बेरोजगार हैं, या फिर महज चंद रुपयों में वे बड़े-बड़े मीडिया हाउस के लिए काम कर रहे हैं, वहीं उनका लिविंग स्टैर्ड भी दोयम दर्जे का है और वे जैसे-तैसे अपना घर चला रहे हैं, बावजूद इसके दीमक लाल जैसे लोग उनकी रोजी-रोटी छीन रहे हैं, लिहाजा बड़े न्यूज चैनल में काम करने वाले इस अधिकारी का नाम पत्रकार और पत्रकारिता के लिए बेहद सूटेबल है, हलांकि ऐसे लोग करीब-करीब हर मीडिया हाउस में अपनी जड़ें जमाए हुए हैं.

क्यों की हमने इतनी मेहनत ?

आप सोच रहे होंगे कि दीमक लाल की डायरी में हमने इतनी एनर्जी क्यों खर्च की, तो जान लीजिये हर बुरे आदमी को आप नहीं पहचान सकते, लेकिन जिसे आप जानते हैं, उसकी सच्चाई अगर सामने नहीं ला सकते तो फिर ऐसी पत्रकारिता का क्या फायदा ? और ये हमारा दृढ़ विश्वास है कि एक दिन हर मीडियाकर्मी इस हकीकत को जान पाएगा.

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