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छग में इनसे है रियासत की सियासत,राजघराने के नेताओं का सत्ता में कितना दखल ?

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नमस्कार दोस्तों, फोर्थ आई न्यूज़ में आप सभी का एक बार फिर से स्वागत है। दोस्तों आज हम आपको बताने जा रहे हैं हमारे छत्तीसगढ़ की कुछ अहम् रियासतों के बारे में। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि ऐतिहासिक काल में चुनाव आज कि तरह नहीं होते थे, आवाम पर किसकी हुकूमत होगी यह राजघराने का ज़िम्मा होता था। पहले राजा-महाराजाओं का शासन था लेकिन धीरे-धीरे जब समय बदला तब सियासत महलों से गुम होती गई और विधानसभा पहुँच गई। वर्तमान में यदि देखा जाए तो छत्तीसगढ़ कि 14 रियासतों में से क्षणिक राजपरिवारों के सदस्य ही विधानसभा के सदस्य हैं। आइए एक नज़र डालते हैं इन राजघरानों और उनसे निकले राजनेताओं पर…

सारंगढ़: जब महज़ 13 दिनों में सिमट गई थी नरेशचंद्र सिंह की सीएम गद्दी
नरेश चन्द्र सिंह सारंगढ़ रियासत के राजा थे। वो 1952 का पहला चुनाव लड़कर इस जगह के विधायक चुने गए। इसके बाद के चुनावों में भी जनसमर्थन हासिल करते हुए वो तीन बार विधायकी बरकार रखने में कामयाब रहे। इस दौरान एक ऐसा भी समय आया जब उन्हें मुख्यमंत्री का पद मिला मगर इस पद पर वो महज़ 13 दिनों के लिए ही काबिज़ हो पाए। उस समय छत्तीसगढ़ राज्य का गठन नहीं हुआ था, लिहाज़ा वो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कहलाए। नरेशचंद्र सिंह की तीन बेटियों कमला देवी, रजनीगंधा और पुष्पादेवी सिंह ने भी राजनीति में भाग्य आज़माया, मगर सफल नहीं हों पाईं। वर्तमान में इस राजपरिवार का कोई भी सदस्य छत्तीसगढ़ की राजनीती में नहीं है।

कोरिया: कुमार साहब का बुझ गया राजनितिक चिराग
कोरिया राजघराने से ताल्लुक रखने वाले रामचंद्र सिंहदेव साल 1967 में पहली बार विधानसभा का चुनाव लाडे। इस चुनाव को जीतकर रामचंद्र सिंहदेव पहली बार संविद सरकार में 16 विभागों के मंत्री बने। अविभाजित मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में उन्होनें 6 बार चुनाव जीता और सभी बार मंत्री रहे। मगर उन्होनें किसी भी चुनाव में शराब नहीं बांटने का प्रण लिया और एकाएक सक्रीय राजनीति त्याग दी। आज के दौर में रामचंद्र सिंहदेव के खानदान से कोई भी हमारे प्रदेश की राजनीति में नहीं है। और इस तरह कुमार साहब के नाम से मशहूर रामचंद्र सिंहदेव का राजनितिक चिराग बुझ गया।

बस्तर: सिर्फ महल तक सीमित भंजदेव राजपरिवार
हमारे छत्तीसगढ़ में एक समय बस्तर के राजमहल की धाक हुआ करती थी। भंजदेव राजघराने की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। प्रवीरचंद भंजदेव 1957 में विधायक बने थे। उनके बेटे कमलचंद भंजदेव भी पिता को देख राजनीती में आए, एक समय उन्होनें युवा आयोग के अध्यक्ष का भी दायित्व संभाला फिर पिछले 2018 के विधानसभा चुनाव में उन्होनें चुनावी ताल भी ठोकी मगर सफलता नहीं मिली। आगामी चुनाव में भी क्या कमलचंद भंजदेव अपनी दावेदारी करेंगे यह फिलहाल स्पष्ट नहीं है। मगर आज यह परिवार केवल राजदरबार तक ही सीमित है।

जशपुर: जूदेव के नाम की थी बादशाहत
जब छत्तीसगढ़ में राजपरिवार का ज़िक्र हो और जूदेव खानदान का नाम ना आए ऐसा हो नहीं सकता। जूदेव राजपरिवार प्रदेश के जशपुर से ताल्लुक रखता है। दिलीप सिंह जूदेव अपनी मूंछों के लिए बहुत मशहूर थे। जूदेव पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी अभिनीत राज्य सरकार में वे वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री रह चुके हैं। उनके निधन के बाद पिछले चुनाव में उनकी पत्नी संयोगिता ने अपनी किस्मत आज़माई लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। वर्तमान में जूदेव परिवार का कोई भी सदस्य सक्रीय राजनीती में नहीं है। हलाकि उनके बेटे युद्धवीर सिंह जूदेव अपने आक्रामक बयानों के चलते गाहे-बगाहे सुर्ख़ियों में आते रहते में हैं।

खैरागढ़: स्व देवव्रत सिंह ने दशकों किया राज
खैरागढ़ रियासत से सम्बन्ध रखने वाले स्व देवरत सिंह दशकों तक कांग्रेस पार्टी के साथ रहे। पार्टी में वो राष्ट्रीय प्रवक्ता और राजनांदगांव से सांसद की ज़िम्मेदारी संभाल चुके हैं। मगर पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान स्व देवव्रत सिंह के कांग्रेस से कुछ मतभेद हो गए जिसके बाद उन्होनें कांग्रेस का दामन छोड़कर जेसिसीजे में प्रवेश कर लिया, जनता जोगी कांग्रेस छत्तीसगढ़ की ही टिकट पर चुनाव लड़ा और जीते भी। उनके निधन के बाद इस सीट पर उपचुनाव हुए लेकिन राजघराने से किसी सदस्य ने चुनाव नहीं लड़ा, लिहाज़ा अब यह सीट कांग्रेस के पास है, पार्टी की यशोदा वर्मा यहाँ से वर्तमान विधायक हैं।

सरगुजा: टीएस बाबा का जलवा बरक़रार
और अब बात करते हैं सरगुजा रियासत की जहाँ के महाराजा त्रिभुनेष्वर सिंहदेव अब तक शान से अपनी धरोहर बचाए हुए हैं। सरगुजा रियासत के शासक चंडीकेश्वर शरण सिंहदेव ने पहली बार 1952 का चुनाव लड़ा था, विधायक बने। अब उनके बाद टीएस सिंहदेव इस रियासत को आगे बढ़ा रहे हैं। वर्तमान में यदि देखा जाए तो छत्तीसगढ़ के राजपरिवारों में सबसे उम्दा स्थिति में सरगुजा राजपरिवार के टीएस सिंहदेव ही हैं। टीएस सिंहदेव छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष भी रह चुके हैं। कांग्रेस ने उन्हें साल 2018 में जन घोषणा पत्र समिति का अध्यक्ष बनाया था। वे खेत से बाजारों तक ग्रामीणों से मिलते रहे हैं। वर्तमान में वो प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री का दायित्व निभा रहे हैं। आगामी समय में कांग्रेस पार्टी का सीएम फेस भी उन्हें कहा जा रहा है।

तो इस तरह से फिलहाल टीएस बाबा ही प्रदेश के एकमात्र ऐसे सक्रीय राजनेता हैं जो राजघराने से ताल्लुक रखते हैं। दोस्तों, क्या इस साल के विधानसभा चुनाव में भी टीएस बाबा अपनी यह रियासत बरक़रार रख पाएंगे ? और क्या कुछ और राजघरानों से भी इस बार दावेदारी देखने को मिल सकती है ? राजपरिवार के सदस्यों का राजनीति में आना इसे आप कितना प्रभावी मानते हैं ?

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