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वाशिंगटन की हेकड़ी पर नई दिल्ली का करारा जवाब: ढह रहा है भारत-अमेरिका दोस्ती का किला ?

सन 2026 की वैश्विक बिसात पर भारत और अमेरिका के रिश्ते अब किसी कूटनीतिक शिष्टाचार के मोहताज नहीं रहे। वाशिंगटन की दादागिरी और हर वैश्विक मुद्दे पर ‘सेंसर बोर्ड’ बनने की आदत को नई दिल्ली ने अब सिरे से खारिज करना शुरू कर दिया है। यह नया भारत है, जो रक्षा सौदों से लेकर कच्चे तेल की खरीद तक, अपनी शर्तों पर फैसले ले रहा है। अमेरिका के थिंक-टैंक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि भारत को दबाने की कोशिश की गई, तो एशिया में अमेरिकी साम्राज्य का ताश का महल ढह जाएगा। दोनों देशों के बीच की खाई अब इतनी चौड़ी हो चुकी है कि इसे केवल मीठी बातों से नहीं भरा जा सकता।

इस आक्रामकता के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिका का दोहरा रवैया है। एक तरफ वाशिंगटन भारत को चीन के खिलाफ एक मोहरे की तरह इस्तेमाल करना चाहता है, तो दूसरी तरफ भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की हिमाकत भी करता है। साल 2026 की शुरुआत से ही व्यापारिक शुल्कों (Tariffs) को लेकर दोनों देशों के बीच तलवारें खिंची हुई हैं। अमेरिकी प्रशासन ने भारतीय आईटी पेशेवरों और निर्यातकों पर जो नए प्रतिबंध मढ़े हैं, उसने आग में घी का काम किया है। नई दिल्ली ने भी साफ कर दिया है कि अगर अमेरिकी बाजार भारतीय कंपनियों के लिए रास्ते बंद करेगा, तो अमेरिकी टेक दिग्गजों को भी भारत में पैर रखने की जगह नहीं मिलेगी।

रक्षा मोर्चे पर भी भारत ने अमेरिका के ‘कैत्सा’ (CAATSA) जैसे प्रतिबंधों की धमकियों को कचरे के डिब्बे में डाल दिया है। भारत अब रूस और यूरेशियाई देशों के साथ मिलकर अपनी सैन्य ताकत को अभेद्य बना रहा है। अमेरिका यह बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है कि कोई देश उसकी छाती पर मूंग दलकर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति चलाए। वाशिंगटन का अहंकार इस बात से आहत है कि भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी कमांडर के तौर पर नहीं, बल्कि एक संप्रभु महाशक्ति के रूप में काम कर रहा है।

आज की तारीख में यह संबंध किसी ‘साझेदारी’ से ज्यादा एक ‘कोल्ड पीस’ (ठंडी शांति) में तब्दील हो चुका है। अमेरिका को यह समझना होगा कि 2026 का भारत 1990 का लाचार देश नहीं है। यदि अमेरिका अपनी प्रतिबंधों वाली घुड़की से बाज नहीं आया, तो वह एशिया में अपने सबसे भरोसेमंद और शक्तिशाली संभावित साथी को हमेशा के लिए खो देगा। यह जंग सिर्फ बयानों की नहीं है, बल्कि यह आर्थिक और रणनीतिक वर्चस्व की सीधी लड़ाई है।


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