देश के सबसे बड़े और सबसे भरोसेमंद सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की सुरक्षा व्यवस्था की आज सुबह धज्जियां उड़ गईं। साइबर अपराधियों ने बैंक के सर्वरों में सेंध लगाकर करीब 3.75 लाख ग्राहकों के डेटा में घुसपैठ की है, जिसमें से लगभग 3,897 ग्राहकों के निजी दस्तावेज, नाम, मोबाइल नंबर और पते सीधे डार्क वेब पर नीलाम होने के लिए डाल दिए गए हैं। इस खबर के आते ही देश भर के करोड़ों बैंक खाताधारकों में हड़कंप मच गया है और सरकार की डिजिटल इंडिया की सुरक्षा प्रणाली कटघरे में खड़ी हो गई है।
यह भयानक साइबर हमला 22 अक्टूबर की सुबह की सबसे बड़ी वित्तीय चिंता बनकर उभरा है। भारतीय कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम (CERT-In) और डिफेंस साइबर एजेंसी से अलर्ट मिलने के बाद एसबीआई प्रबंधन ने माना कि एक खतरनाक डेटा लीक हुआ है। डार्क वेब पर बिक रहे इस डेटा में आम नागरिकों की बेहद संवेदनशील जानकारियां शामिल हैं, जिनका इस्तेमाल कर साइबर ठग लोगों के बैंक खातों को मिनटों में खाली कर सकते हैं।
विपक्ष ने इस मुद्दे को लेकर सीधे वित्त मंत्रालय और बैंक प्रबंधन को निशाने पर लिया है। आम जनता यह सवाल पूछ रही है कि जब देश का सबसे बड़ा बैंक ही अपने ग्राहकों की गाढ़ी कमाई और निजी जानकारी को सुरक्षित नहीं रख सकता, तो आम नागरिक किस पर भरोसा करें? बैंक अधिकारियों का दावा है कि सेंधमारी के स्रोत को ब्लॉक कर दिया गया है और प्रभावित खातों की निगरानी बढ़ा दी गई है, लेकिन यह सफाई करोड़ों भारतीय उपभोक्ताओं के मन से वित्तीय धोखाधड़ी का खौफ निकालने में नाकाम रही है। साइबर एक्सपर्ट्स इसे भारतीय बैंकिंग इतिहास का बेहद संगीन और गंभीर सुरक्षा फेलियर मान रहे हैं।
आज डिजिटल भारत का दावा करने वाली सरकार को इस कड़वी हकीकत का सामना करना ही होगा कि हमारी साइबर सुरक्षा व्यवस्था बेहद लचर स्थिति में है। आम जनता के विश्वास को डार्क वेब पर बिकने के लिए छोड़ देना न केवल बैंक की प्रशासनिक नाकामी है, बल्कि एक देश के रूप में हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा प्रणाली पर भी बहुत बड़ा धब्बा है।
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