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अमेरिका-ईरान फिर आमने-सामने, खाड़ी में बढ़ा खतरा; भारत के लिए भी मंडराया तेल और समुद्री संकट

US and Iran face off again; threat level rises in the Gulf; oil and maritime crisis looms for India too.

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव 22 अगस्त 2026 को एक बार फिर बेहद गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। दोनों देशों ने एक-दूसरे के खिलाफ कड़े बयान दिए हैं और सोमवार को अमेरिका की ओर से नए प्रतिबंधों की घोषणा की तैयारी चल रही है। ऐसे समय में खाड़ी क्षेत्र का तनाव भारत के लिए सिर्फ कूटनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार का भी बड़ा सवाल बन गया है।

ईरान और अमेरिका के बीच लगातार बढ़ती तनातनी का सबसे बड़ा असर ऊर्जा बाजार पर पड़ रहा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर भी दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। ईरान का कहना है कि महत्वपूर्ण जलमार्ग अभी भी बंद है, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसके विपरीत दावा कर चुके हैं।

भारत के लिए यह संकट इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार के लिहाज से रणनीतिक क्षेत्र है। खाड़ी में लंबे समय तक तनाव रहने पर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और समुद्री परिवहन लागत बढ़ने का सीधा दबाव भारत पर पड़ सकता है।

भारत लंबे समय से पश्चिम एशिया में संतुलित कूटनीति की नीति अपनाता रहा है। नई दिल्ली के सामने एक तरफ अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध हैं तो दूसरी ओर ईरान के साथ ऐतिहासिक और ऊर्जा संबंध भी हैं। ऐसे माहौल में भारत किसी एक खेमे में खुलकर जाने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता रहा है।

ईरान और अमेरिका के बीच टकराव जितना लंबा खिंचेगा, भारत के सामने उतना ही बड़ा सवाल होगा—ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित कैसे रखा जाए और पश्चिम एशिया में अपने रणनीतिक हितों को कैसे बचाया जाए।

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