खेल समाचार | क्रिकेट, फुटबॉल, ओलंपिक | Fourth Eye News।Sports

राष्ट्रमंडल खेल 2026: क्या सिर्फ कागजी शेर हैं हमारे एथलीट? दबाव में फिर निकला भारतीय खिलाड़ियों का दम!

करोड़ों रुपये का बजट, विदेशी कोचों का लश्कर और सोशल मीडिया पर चमकते-दमकते दावे—ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल 2026 में 29 जुलाई की सुबह तक भारतीय फैंस के हाथ सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें और नाकामी ही आई हैं। जब-जब पोडियम पर तिरंगा लहराने और स्वर्णिम इतिहास रचने का वक्त आता है, हमारे खिलाड़ी दबाव में ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं। ग्लासगो के मैदान पर छठे दिन जो शर्मनाक और लचर प्रदर्शन देखने को मिला है, उसने भारतीय खेल तंत्र (स्पोर्ट्स इकोसिस्टम) की पोल खोलकर रख दी है।

राष्ट्रीय रिकॉर्डधारी हाई जंपर पूजा सिंह से देश को पदक की उम्मीद थी। 1.93 मीटर का रिकॉर्ड अपने नाम रखने वाली पूजा बारिश और मामूली दबाव के सामने ऐसा घबराईं कि 1.82 मीटर की आसान सी ऊंचाई भी पार नहीं कर सकीं और बिना किसी पदक के रेस से बाहर हो गईं। क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मौसम और मानसिक दबाव का बहाना बनाकर देश के आत्मसम्मान का सौदा किया जाएगा?

इससे भी बड़ा झटका वेटलिफ्टिंग में लगा, जहाँ निरुपमा देवी सेरम ने क्लीन एंड जर्क में एक भी सफल लिफ्ट दर्ज नहीं की और ‘नो रिजल्ट’ के साथ शर्मनाक तरीके से बाहर हो गईं। सालों की तैयारी, लाखों का खर्चा और मंच पर जाकर शून्य! बॉक्सिंग रिंग में भी परवीन हुड्डा और कपिल पोखरिया अपने-अपने क्वार्टर फाइनल मुकाबलों में पूरी तरह बेबस नजर आए।

हालांकि गुलवीर सिंह ने 10,000 मीटर में रजत जीतकर लाज बचाने की कोशिश की और हरजिंदर कौर ने सिल्वर हासिल किया, लेकिन सवाल यह है कि भारत जैसे 140 करोड़ की आबादी वाले देश को हर बड़े टूर्नामेंट में सिर्फ कुछ गिने-चुने व्यक्तिगत प्रदर्शनों के भरोसे कब तक ढोया जाएगा? हम पदक तालिका में नौवें स्थान पर घिसट रहे हैं। महासंघों में बैठी नौकरशाही और आत्ममुग्ध अधिकारियों को जवाब देना होगा कि आखिर बुनियादी मौकों पर भारतीय खिलाड़ी क्यों पस्त हो जाते हैं? यह हार नहीं, सिस्टम का आत्मसमर्पण है!

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button